Bet Dwarka Kya Hai?: प्रेम, पूजा, दोस्ती और आस्था का प्रतीक!

Bet Dwarka Kya Hai?: समुद्र की गोद में बसा बेट द्वारका हिंदू धर्म में सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। भारतवर्ष की सबसे प्राचीन, पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहर है। भगवान श्री कृष्ण और श्री सुदामा की मित्रता की मिसाल है। प्रेम, पूजा, दोस्ती और आस्था का प्रतीक है। मोक्ष का द्वार, प्रकृति का घर और रोमांच का समुद्र है।

बेट द्वारका क्या है (Bet Dwarka Kya Hai)? इसे करीब से जानने के लिए, हमें द्वापर युग में चलना होगा। यानी भगवान श्री कृष्ण का युग! भारतवर्ष के सुनहरे पन्नों में से एक, ‘महाभारत काल’।

मथुरा, उत्तर प्रदेश छोड़ने के बाद, भगवान श्री कृष्ण अपने नए राज्य ‘द्वारका के द्वारकाधीश’ बन चुके थे। समुद्रदेव ने उन्हें, द्वारका नगरी बसाने के लिए ‘बारह योजन भूमि’ दे दी थी। भगवान विश्वकर्मा ने अपनी तराशी कारीगरी से समुद्र की भूमि पर ‘दिव्य लोक’ का निर्माण कर दिया था। रत्न, पन्ने और सोने से बना देवभूमि द्वारका आकर्षण का केंद्र था! तब दुनिया इसे ‘सुवर्ण द्वारका’ बुलाती थी। श्री द्वारकाधीश का साम्राज्य 84 वर्ग किमी में फैला हुआ था। उसी क्षेत्र का एक हिस्सा है ‘बेट द्वारका’ (Bet Dwarka), श्री केशव की आराम स्थली।

सुदामा के बाल सखा कान्हा, बड़े होकर राजा बन चुके थे। लेकिन, दरिद्रता ने सुदामा का साथ नहीं छोड़ा था। श्री कृष्ण, बड़े भाई श्री बलराम और श्री सुदामा सहपाठी थे। महर्षि सांदीपनि के आश्रम उज्जैन, मध्य प्रदेश में साथ पढ़ते थे। आज भी यह धरोहर वहां देखी जा सकती है।

“द्वारकाधीश का मित्र! तीनों लोक के स्वामी का सखा! दो जून की रोटी के लिए तरसता है। कमाल है! जाओ, अपने धनी सखा से कुछ धन ले लाओ। जीवन हमारा भी सुख-शांति से व्यतीत हो सके। प्रतिदिन की चुटकी-भर भिक्षा से अब कुछ नहीं होगा। बच्चे बड़े हो रहे हैं।” पत्नी सुशीला हर दिन पति सुदामा पर ताने कसती रहतीं।

श्री सुदामा जी गरीब ब्राह्मण भले थे, लेकिन स्वाभिमानी थे। ज्ञानी और दूरदर्शी थे। जानते थे कि मोहन एक पल में दुःख सदा के लिए मिटा देंगे। संकोच, स्वाभिमान का दूसरा नाम है। मित्र के साथ मित्रता की तरह व्यवहार करना चाहते थे। उन्हें अपनी दरिद्रता से परिचित नहीं कराना चाहते थे। पर ग़रीबी, झुकने के लिए मज़बूर कर देती है साहब। आत्मसम्मान की कमर तोड़ देती है।

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Bet Dwarka की तस्वीर – gyanmanch के सौजन्य से

वक़्त के हाथों बेबस गरीब ब्राह्मण, पत्नी की तीर जैसी बातों से लाचार हो गए थे। एक दिन पोटली उठाई। चल पड़े श्री द्वारकाधीश से मिलने। मोक्ष-भूमि द्वारका पहुंचने पर श्री सुदामा को पता चला कि महाराज श्री कृष्ण वहां हैं ही नहीं। वो तो अपने बेट द्वारका (Bet Dwarka) वाले महल गए हैं। कठिन यात्रा अभी बाकी थी। तब द्वारका नगरी प्रभु श्री कृष्ण की राजधानी हुआ करती थी। पर भगवान अपने परिवार के साथ बेट द्वारका (Bet Dwarka) के आवासीय महल में रहते थे।

बेट द्वारका (Bet Dwarka) यानी समुद्र की गोद में बसा बेहद खूबसूरत स्थान। चारों ओर समुद्र, बीच में द्वीप, और उस पर विराजमान श्री द्वारिकाधीश मंदिर और सेवा में मौजूद भक्तगण हैं। कोई पुजारी बनकर, तो कोई समुद्र पार लगाकर, भगवान श्री कृष्ण भक्त की सेवा में समर्पित हैं। उनका भक्ति भरा जीवन का सफ़र कमाल का है।

नाव पर सवार होकर, श्री सुदामा समुद्र तो पार कर गए। लेकिन, महल में प्रवेश पाना कहां आसान था? दरबान अंदर जाने ही नहीं दे रहे थे। उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा था कि एक दरिद्र ब्राह्मण, श्री द्वारिकाधीश का मित्र हो सकता है। बड़ी मेहनत के बाद सफलता उनके हाथ लगी। दरबानों ने महल में प्रवेश की अनुमति दे दी। कुछ पल बाद, दोनों बालसखा एक-दूसरे के गले में थे। दिल-से-दिल मिल रहे थे। आंखों से आंसू की धारा निकल रही थी। मिलते ही जिंदा हो गए बीते सुनहरे दिन। चंचलता वाले किस्से। प्रेम वाली बातें!

अपने सिंहासन पर ग़रीब ब्राह्मण को बैठाकर, जब श्री द्वारका नरेश उनके पैरों को धो रहे थे। वह दृश्य देख सारी द्वारका नगरी हैरान थी। खाने के लिए घर में अनाज नहीं थे। पर, मित्र के लिए मुठ्ठी भर कच्चे चावल सुदामा जी साथ लाए थे। सखा को उपहार देने के लिए! बेचारे दुविधा में फंसे थे। संकोच के बादलों ने उन्हें घेर रखा था। “एक राजा को मुठ्ठी-भर चावल, कोई उपहार में कैसे दे सकता है?”

भगवान तो अंतर्यामी हैं। दिल की बात जानने वाले! छीन लिए मित्र के हाथों से पोटली। खाने लगे, प्रेम के कच्चे चावल बड़े चाव से! चावल खाते ही श्री कृष्ण ने श्री सुदामा की सारी परिस्थिति जान ली। उनकी ग़रीबी, उनके दुःख, उनकी पीड़ा, सब समझ गए। बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए। इसे कहते हैं असली मित्र।

इधर श्री सुदामा ने श्री कृष्ण को चावल भेंट किया। उधर उनकी दरिद्रता सदा के लिए भगवान ने खा ली। ग़रीब सुदामा अब अमीर सुदामा बन चुके थे। तब से यह स्थान ‘भेंट द्वारका’ बन गया। यानी इसी स्थान पर श्री सुदामा ने श्री कृष्ण को चावल ‘भेंट’ दिया था। और प्रभु ने उन्हें तीन लोक भेंट किया था। यहां ‘भेंट’ का अर्थ ‘उपहार’ (गिफ्ट) है। कुछ लोग इसे श्री कृष्ण और श्री सुदामा का ‘भेंट’ स्थल मतलब ‘मुलाकात’ स्थली मानते हैं। गुजरात में यह स्थान बेट द्वारका (Bet Dwarka) के नाम से प्रसिद्ध है। देवभूमि द्वारका के स्थानीय लोग इसे बेट द्वारका (Bet Dwarka) कहते हैं।

Bet Dwarka Kya Hai जानने के बाद, चलिए जानते हैं कि भेंट द्वारका, बेट द्वारका (Bet Dwarka) क्यों कहा जाता है?

गुजराती में ‘बेट’ का अर्थ होता है ‘द्वीप’। यानी देवभूमि द्वारका का यह हिस्सा समुद्र के एक द्वीप पर स्थित है। चारों ओर समुद का नीला और स्वच्छ पानी है। बीच में है एक खूबसूरत द्वीप। इसलिए, इसे ‘बेट द्वारका’ (Bet Dwarka) कहा जाता है। द्वारका शहर जहां समतल भूमि पर है स्थित है। वहीं बेट द्वारका (Bet Dwarka) एक द्वीप पर बसा है। द्वारका में भगवान कृष्ण का राजमहल था और बेट द्वारका (Bet Dwarka) में उनका आवासीय महल था। भगवान श्री कृष्ण के द्वारका छोड़ने के बाद, समुद्रदेव ने कई बार अपना गुस्सा दिखाया। ऐसे ही एक बार, समुद्र नरेश ने पूरी द्वारका नगरी को डुबो दिया था। पर ऊंचे टापू पर विराजमान बेट द्वारका (Bet Dwarka) तक उनका प्रकोप नहीं पहुंच सका था।

Bet Dwarka की तस्वीर – gyanmanch के सौजन्य से

बेट द्वारका का आकर्षण

बेट द्वारका (Bet Dwarka) का मुख्य आकर्षण भगवान श्री कृष्ण की मनमोहक मूरत हैं। मंदिर में मौजूद भगवान की इस प्रतिमा को स्वयं माता रुक्मिणी ने स्थापित की थी। उन्होंने ने ही अपने हाथों से भगवान श्री द्वारकाधीश की प्रतिमा तैयार की थी। यह शुभ कार्य 5244 वर्ष पहले किया गया था। देवी रुक्मिणी प्रभु श्री कृष्ण की पटरानी यानी 8 प्रमुख रानियों में से एक थीं।

प्रतिमा की स्थापना भगवान के शरीर त्यागने के बाद हुई थी। द्वारकाधीश श्री कृष्ण बेट द्वारका (Bet Dwarka) में अपने जिस आवासीय महल में परिवार के साथ रहते थे, अब वही भक्तों के लिए तीर्थ स्थल है। बेट द्वारका (Bet Dwarka) में मंदिर का निर्माण 500 साल पहले हुआ था। इसकी उपलब्धि महाप्रभु संत वल्‍लभाचार्य जी को जाती है।

मुख्य मंदिर में विराजमान भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा आकर्षण का मुख्य केंद्र है। जिसमें रुक्मिणी देवी की बेशकीमती कारीगरी की झलक दिखती है। भगवान की मनमोहक सूरत देख मन खुशी से खिल उठता है। पूरे दिन उनके अलग-अलग श्रृंगार किए जाते हैं। यहां श्री कृष्ण के ग्वाले के रूप में दर्शन होते हैं। जहां वे गौमाता के साथ खड़े अपनी बांसुरी बजा रहे हैं।

मंदिर परिसर के भीतर बड़े-बड़े महलों का दीदार होता है। पहले महल में भगवान श्री कृष्ण रहते हैं। यह महल, हर महल यानी सबसे बड़ा है। इस महल की उत्तर दिशा में रुक्मिणी देवी और राधा रानी के महल हैं। दक्षिण दिशा में रानी सत्यभामा और जाम्बवती के महल सुशोभित हैं। दरवाज़ों और चौखटों पर चढ़ी चांदी की परतें, इन महलों की शान बढ़ाती हैं।

भगवान श्री कृष्ण और उनकी चारों रानियां चांदी के सिंहासन पर विराजमान हैं। हीरे, मोती और सोने के गहनों से सुसज्जित उन प्रतिमाओं को देखकर नज़रें ठहर-सी जाती हैं। ऊपर से सुंदर जरी वाले कपड़े, खूबसूरती में चार-चांद लगाते हैं। मंदिर में हांडी से माखन चुराकर खाते बाल श्री कृष्ण की तस्वीर भी मन को खूब लुभाती है। एक उंगली में गोवर्धन पर्वत उठाए, और वन में बांसुरी बजाते मोहन की मनमोहक छवि आकर्षित करती है।  

श्री द्वारकाधीश मंदिर परिसर के भीतर उनके परिवार के सदस्यों के भी मंदिर मौजूद हैं। मां राधिका रानी मंदिर, ज्येष्ठ भ्राता श्री बलराम मंदिर, श्री कृष्ण-रुक्मिणी पुत्र श्री प्रद्युमन मंदिर, माता देवकी मंदिर, मां महालक्ष्मी मंदिर, श्री कृष्ण के काका श्री माधव राय मंदिर, श्री कृष्ण की कुल देवी अम्बाजी मंदिर सहित और कई मंदिर हैं। इसके अलावा, भक्तों को यहां भगवान श्री हनुमान, श्री विष्णु, श्री शिव, श्री लक्ष्मी नारायण और भगवान श्री कृष्ण की पत्नी जाम्बवन्ती देवी के दर्शन के सौभाग्य प्राप्त होते हैं।

कहते हैं कि श्री बेट द्वारकाधीश मंदिर में दिन-भर में कई अनुष्ठान किए जाते हैं। 13 बार भगवान को भोग लगाया जाता है। 9 बार आरती होती है। 22 देव दर्शन होते हैं। भगवान श्री कृष्ण का दिव्य और अलौकिक रूप देखना हो, तो जन्माष्टमी के दिन जाएं। क्योंकि, इस अवसर पर भगवान का श्रृंगार भव्य रूप में किया जाता है।

बेट द्वारका (Bet Dwarka) जाने के दो मुख्य कारण

1. कहते हैं कि बेट द्वारका (Bet Dwarka) में जो श्रद्धालु चावल दान करता है, उसकी दरिद्रता सदा के लिए चली जाती है। उसके दुःख-दर्द हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं। क्योंकि, इसी पवित्र स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने श्री सुदामा की ग़रीबी दूर की थी। इसलिए, यहां चावल दान का महत्त्व है। श्री द्वारकाधीश के दर्शन करने वाले भक्त चावल दान ज़रूर करते हैं। मंदिर का अपना अन्न क्षेत्र भी है।

2. ऐसा माना जाता है कि श्री द्वारिकाधीश मंदिर में भगवान श्री कृष्ण के दर्शन के बाद, बेट द्वारका (Bet Dwarka) ज़रूर जाना चाहिए। बेट द्वारका (Bet Dwarka) मंदिर में स्थापित श्री कृष्‍ण और श्री सुदामा की प्रतिमाओं की पूजा ज़रूर करनी चाहिए। श्री बेट द्वारका मंदिर में श्री कृष्‍ण के साथ, श्री सुदामा की प्रतिमा पूजी जाती है। द्वारका यात्रा का पूरा फल तभी मिलता है, जब तीर्थयात्री बेट द्वारका (Bet Dwarka) की यात्रा पूरी करता है।

Bet Dwarka की तस्वीर – gyanmanch के सौजन्य से

गोमती द्वारका से बेट द्वारका (Bet Dwarka) की दूरी

Bet Dwarka Kya Hai: बेट द्वारका (Bet Dwarka) को शंखोद्धार के नाम से भी जाना जाता है। कच्छ की खाड़ी में स्थित यह द्वीप, समुद्र तट पर स्थित ओखा से 5 किमी की दूरी पर है। द्वीप की लंबाई उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक लगभग 13 किमी है। औसत चौड़ाई 4 किमी है। द्वारका नगरी से बेट द्वारका (Bet Dwarka) की दूरी करीब 35 किमी है। 30 किमी का सफ़र सड़क मार्ग से ओखा तक करना पड़ता है। वहां से 5 किमी की यात्रा नाव (फेरी बोट सेवा) से करनी पड़ती है। शंखोद्धार (Bet Dwarka) सब तीर्थों में प्रधान तीर्थ स्थल है।

बेट द्वारका (Bet Dwarka) सड़क द्वारा
सबसे नजदीकी बस स्टेशन ओखा पोर्ट है। अच्छी सड़क से वेल कनेक्टेड है। ओखा शिपयार्ड से पब्लिक फेरी में 15 मिनट की सवारी करें। उसके बाद लगभग 1 किमी पैदल चलें। ऑटो रिक्शा में सवार होकर भी मुख्य मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। फेरी का किराया 20 रुपए प्रति व्यक्ति है। मौजूदा समय में बेट द्वारका (Bet Dwarka) पहुंचने के लिए ओखा से नौका सवारी ही एकमात्र साधन है। लेकिन, आने वाले समय में यह रोमांच खत्म होने वाला है। ओखा को बेट द्वारका (Bet Dwarka) से जोड़ने वाले समुद्री पुल की नींव 2017 में रखी जा चुकी है। ब्रिज का निर्माण कार्य प्रगति पर है। फिलहाल के लिए बेट द्वारका का दर्शन दिन में करना ठीक रहेगा।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • नौका की सवारी सुबह 6 से शाम 7 बजे तक उपलब्ध है
  • मंदिर में मोबाइल, हैंड बैग, आदि ले जाना मना है
  • ज़्यादातर मंदिर दोपहर में बंद रहते हैं
  • खाने-पीने की ठीक सुविधाएं नहीं हैं
  • रहने के लिए अच्छे होटल नहीं हैं
  • बेहतर होगा होटल मुख्य द्वारका शहर में लें
  • लगेज साथ लेकर नहीं, होटल में रखकर जाएं
  • पानी की बोतल ज़रूर साथ रखें
  • छोटे बच्चे की सुविधा का ध्यान रखें

बेट द्वारका जाने के लिए सही मौसम

बेट द्वारका (Bet Dwarka) यात्रा करने का सबसे अच्छा समय नवंबर और फरवरी के बीच माना जाता है। इस दौरान मौसम का मिज़ाज ठंडा रहता है। अगर भव्य त्यौहार का आनंद उठाना है, तो जन्माष्टमी के समय जाएं। बाकी जब आपके वक़्त हो, तब जाएं।

मंदिर-महल के साथ-साथ बेट द्वारका (Bet Dwarka) में भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कई विरासतें मौजूद हैं। रणछोड़ तालाब, रत्न तालाब, कचौरी तालाब और शंख तालाब जैसे कई पौराणिक तालाब हैं। देखने और घूमने के लिए बेट द्वारका में बहुत कुछ है। अच्छे से घूमने के लिए पूरा दिन काफी है।

Bet Dwarka की तस्वीर – gyanmanch के सौजन्य से

द्वारका से बेट द्वारका कैसे जाए? Dwarka Se Bet Dwarka Kaise Jaye?   

व्यक्तिगत अनुभव (Personal Experience)

Bet Dwarka Kya Hai: मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता रहा हूं कि द्वारका से बेट द्वारका कैसे जाएं (Dwarka Se Bet Dwarka Kaise Jaye)? हमें देवभूमि द्वारका, गुजरात आए एक दिन और एक रात बीत चुकी थी। परिवार और मित्र का परिवार साथ थे। इस दौरान, हम श्री द्वारिकाधीश मंदिर में भगवान श्री कृष्ण के दर्शन कई बार कर चुके थे। द्वारका नगरी को अच्छी तरह से देख चुके थे। कई आउटडोर एक्टिविटी का आनंद उठा चुके थे। लोकल से लेकर अन्य भारतीय और विदेशी व्यंजनों का लुफ्त उठा चुके थे। स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए बेजोड़ वस्तुओं की खरीदारी कर चुके थे। अब तैयारी थी, तो बस बेट द्वारका (Bet Dwarka) निकलने की। कभी न देखे स्थान को देखने की।

द्वारका से बेट द्वारका कैसे जाए? Dwarka Se Bet Dwarka Kaise Jaye? 

अगली सुबह 5 बजे होटल में स्नान करने के बाद, हम सुबह 6 बजे श्री द्वारिकाधीश मंदिर में द्वारका के राजा भगवान श्री कृष्ण के भव्य रूप का अलौकिक दर्शन कर रहे थे। दर्शन और पूजा से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद, सुबह 7 बजे हम होटल के पास एक टपरी वाली कड़क चाय की चुस्कियां ले रहे थे। उस दरमियान हमने बेट द्वारका (Bet Dwarka) जाने के लिए गाड़ी रिज़र्व कर ली थी। हमने जो गाड़ी बुक की थी, वह एक बड़ी रिक्शा थी। जिसमें हम सभी बड़े आराम से बैठ चुके थे।

Dwarka से Bet Dwarka जाने के लिए तमाम टूरिस्ट एसी गाड़ियां 2-3 हज़ार में मिल जाती हैं। जो बेट द्वारका (Bet Dwarka), गोपी तलाब और श्री नागेश्वर मंदिर में श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करा देती हैं। हमने ऑटो चुना, क्योंकि परिवार के एक सदस्य को एसी गाड़ी में बैठने की समस्या थी। सुबह 7:30 बजे हम देवभूमि द्वारका नगरी छोड़ चुके थे। अब हमारी गाड़ी बेट द्वारका (Bet Dwarka) जाने वाली लंबी-चौड़ी और साफ़-सुथरी सड़क पर अपनी क्षमता के अनुसार दौड़ी जा रही थी।

ऑटो के साथ सड़क के दोनों ओर दूर तक फैले कांटेदार पेड़ भी दौड़ रहे थे। बढ़ती गाड़ी और चलते समय के साथ, सूरज की किरणें अब धूप का विकराल रूप ले चुकी थी। गर्म हवाओं के साथ ऑटो की छत, आग उगलने लगी थी। मध्य मई की गर्मी क्या होती है? यहां पता चल जाता है। माथे से पसीना तो नहीं निकल रहा था, लेकिन मन पूरी तरह से भीग चुका था। सबका! सड़क के आस-पास का नज़ारा देखते, गर्मी का कहर झेलते और बातचीत के दौरान, लगभग 2 घंटे में हमारी गाड़ी बेट द्वारका (Bet Dwarka) के समुद्र तट पर थी।

Bet Dwarka Kya Hai: रोड का सफ़र समाप्त हो चुका था। अब समुद्र के रास्ते भगवान श्री कृष्ण के दर्शन के लिए जाना था। गर्मी थी, छुट्टी थी, इसलिए भीड़ भी खूब थी। 10-15 मिनट इंतज़ार के बाद, हम फेरी बोट में सवार थे। समुद्रदेव का अलग रूप देख रहे थे। पानी का रंग ग्रीन था या ब्लू था, पता नहीं, जो भी था, लाजवाब था। एकदम स्वच्छ, चांदी की तरह। धूप के साथ पानी चमक रहा था। हवा में नमी थी। राहत थी। बिना छत वाली फेरी में भी सुकून का अहसास था।

Bet Dwarka Kya Hai: फेरी बोट में सवार सभी श्रद्धालु और पर्यटक तस्वीरें निकालते नहीं थक रहे थें। चारों ओर समुद्र का स्वच्छ और सुंदर नज़ारा, देखते ही बनता था। ऊपर से मनमोहक पक्षियों के झुंड आनंद को चरम सीमा पर पहुंचा रहे थे। उनका सुहावना अंदाज़ लोगों को आकर्षित कर रहा था। लगभग 15-20 मिनट की नाव सवारी के बाद हम एक मनमोहक द्वीप पर थे। जिसे लोग कहते हैं बेट द्वारका। भगवान श्री कृष्ण और संत श्री सुदामा की मित्रता की मिसाल। भक्तों की आस्था का केंद्र। सनातन धर्म का गौरव।

लगभग एक किमी पैदल चलने और सड़क के किनारे सजी दुकानों को देखते हुए, हम श्री द्वारिकाधीश के महल के सामने सिर झुकाए खड़े थे। भगवान का महल ही उनका मंदिर है। कुछ घंटों की कतार के बाद, हम भगवान श्री कृष्ण के अनदेखे रूप का दीदार कर रहे थे। सभी भक्त प्रभु की उस अलौकिक प्रतिमा को अपनी नज़रों से सीधे दिल की तिजोरी में सदा के लिए कैद कर लेना चाहते थे, जिसे ख़ुद मां रुक्मणि ने तरासा था।

Bet Dwarka Kya Hai: लगभग आधे घंटे में मंदिर में मौजूद सभी देवी-देवताओं के दर्शन हो चुके थे। पुजारी ने Bet Dwarka के पौराणिक महत्त्व को बता दिया था। चावल दान की विशेषता बता दी थी। श्री कृष्ण और श्री सुदामा की ‘भेंट दास्तान’ सुना चुके थे। अब हम मंदिर के बाहर कुछ पेड़ों के नीचे धूप और गर्मी के प्रकोप से बचने की कोशिश कर रहे थे। आराम के लिए आश्रय ढूंढ रहे थे। बेट द्वारका में तीर्थयात्रियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। समुद्र पर पुल निर्माण होने के बाद, शायद बुनियादी सुविधाओं का विकास हो सके।

लगभग दोपहर 1 बजे तक बेट द्वारका (Bet Dwarka) की यात्रा पूरी हो चुकी थी। हम फेरी के जरिए, समुद्र का अनदेखा रूप निहारते हुए वापस इस पार आ चुके थे। अब हम गाड़ी में सवार होकर ‘गोपी तालाब’ देखने के लिए निकल चुके थे। उस दौरान हमने ‘देश का नमक, टाटा नमक’ की फैक्ट्री देखी, जो दूर तलक फैली हुई है। ‘गोपी तालाब’ की सैर, मैं आपको अपने अगले आर्टिकल में कराऊंगा। पढ़ते रहिए gyanmanch, क्योंकि ज्ञान नया, मिलेगा यहां!

अधिक जानकारी के लिए Gujarat Tourism की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

इसे भी पढ़ेंगे, तभी समझेंगे कि Bet Dwarka Kya Hai?

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