Bharat Ki Prasiddh Holi: ऐतिहासिक रिवाज, शाही अंदाज़

जब-जब होली का जिक्र होता है, तब-तब मथुरा-वृंदावन की होली याद आ जाती है। भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा-बरसाना की होली भारत की प्रसिद्ध होली (Bharat Ki Prasiddh Holi) है, जिसकी चर्चा विश्वभर में की जाती है। लेकिन, इस आर्टिकल में आप मथुरा-वृंदावन की नहीं, बल्कि प्रयागराज जिले में मनाई जाने वाली ऐतिहासिक होली के बारे में जानेंगे। यह भारत का सबसे प्रसिद्ध त्योहार केवल उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण क्षेत्र में मनाया जाता है। आइए जानते हैं कि कहां की होली प्रसिद्ध है?

होली भारत का ही नहीं, बल्कि विश्व का सबसे प्रसिद्ध त्योहार है।

आपको राज की बात बताते हैं कि भारत की प्रसिद्ध होली (Bharat Ki Prasiddh Holi) सिर्फ़ एक या दो दिन नहीं, बल्कि पूरे हफ्ते मनाई जाती है।

कहीं-कहीं यह प्रसिद्ध त्योहार महीनों पहले से मनाया जाने लगता है।

यह अद्भुत परंपरा विशेषकर आप उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में देख सकते हैं।

भारत का सबसे प्रसिद्ध त्योहार (Bharat Ki Prasiddh Holi)

फाल्गुन माह शुरू होते ही होली का माहौल बनने लगता है।

जोर-शोर से तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं।

रात भोजन ग्रहण करने के बाद अक्सर गांव के युवा और बुजुर्ग किसी स्थान पर हर दिन मिलते हैं।

उसके बाद ढोल, मृदंग, मजीरा, हारमोनियम आदि पर घंटों रियाज करते हैं।

यह सिलसिला होली के एक दिन पहले तक चलता है।

फाल्गुन के समय अगर कोई व्यक्ति अपने किसी रिश्तेदार के घर पहुंच जाता है, तो वापसी बिना रंगों में नहाए नहीं हो सकता है।

उसके ऊपर कोई न कोई लेडी रंग अवश्य डाल देती है।

ऐसे किस्से विशेषकर तब देखे जाते हैं, जब रिश्ता देवर और भाभी का होता है।

होली का महीना शुरू होते ही गांव की भाभियां और देवर दोनों ही सतर्क हो जाते हैं।

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घर से बाहर निकलते ही आंखें चौकन्नी हो जाती हैं।

भारत की प्रसिद्ध होली

होली के समय अधिकांश लोग अपने पास-पड़ोस के घर जाने से भी बचते हैं।

नए कपड़े पहनने से परहेज करते हैं। क्योंकि, उन्हें पता नहीं होता है कि किस दिशा से रंगों की बारिश शुरू हो जाए।

ऐसा जीवंत जीवन केवल आपको उत्तर प्रदेश के रूरल एरिया में देखने को मिलेगा।

आज से कुछ वर्ष पहले तक होलिका दहन पर जलने वाली लकड़ी आदि की चोरी की जाती थी।

रात को 10-12 बजे के बाद गांव के नवयुवक नहर आदि पर इकठ्ठा होते थे और लकड़ी चोरी करने की प्लानिंग करते थे। आज कौन से गांव में चलना है, पहले इसकी योजना बनाते थे।

आजकल यह परंपरा लगभग बंद होने के कगार पर है। इसकी वजह बहुत सारे लोग पेड़-पौधों के महत्त्व को समझने लगे हैं।

इसलिए, पेड़ों को काटने की वजाय, गिरे हुए पेड़ों की लकड़ियों और कृषि अपशिष्टों का उपयोग करने लगे हैं।

ऐतिहासिक होली का रहस्य

आइए जानते हैं कि कहां की होली प्रसिद्ध है? यह बहुत ही कम लोग जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में ऐतिहासिक होली मनाई जाती है।

हर होली से जिसका रंग सबसे अलग है। जिसकी परंपरा सबसे अद्भुत और अंदाज़ सबसे अनूठा है।

भारत की इस प्रसिद्ध होली (Bharat Ki Prasiddh Holi) में जो व्यक्ति एक बार शामिल हो जाता है, फिर सालभर इस दिन के आने का इंतजार करता है।

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उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के ग्रामीण क्षेत्र में भव्य होली मनाई जाती है।

इस त्योहार में 8 गांव के लोग एक साथ सम्मिलित होते हैं।

होली की सुबह यानी जिस दिन रंग खेला जाता है, श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम, ककरा में हजारों की भीड़ उमड़ती है।

बड़े-बड़े ढोल-नगाड़ों के गर्जना के बीच बारी-बारी गांव वाले अपनी भक्ति और प्रतिभा का तब तक प्रदर्शन करते हैं, जब तक कि शरीर जवाब नहीं दे देता है।

कहां की होली प्रसिद्ध है?

यहां मनाई जाने वाली होली की रीति बहुत न्यारी है। सदियों से लोग इस नियम का पालन करते आ रहे हैं।

होलिका दहन के बाद सुबह से दोपहर तक लोग रंगों की होली खेलते हैं। घर-घर घूमकर रस-भंगा पीते हैं।

रस-भंगा मतलब भांग से बनी ठंडाई या शरबत। गुझिया का सिलसिला तो दो-तीन या उससे पहले ही शुरू हो जाता है।

लोग एक-दूसरे को बड़े प्यार से रंग-गुलाल लगाते हैं। गले मिलते हैं। शिकवे-शिकायत भूल जाते हैं।

कहीं डीजे पर नाचते-गाते लोग मिलेंगे। कहीं ‘कबीरा सा रा रा रा’ गाते दीवाने दिखाई देंगे।

भांग और पान के शौकीन यहां आपको बड़े पैमाने पर मिलेंगे। या यूं कहें कि यह यहां की प्राचीन विरासत है।

दोपहर की होली मनाने के बाद लोग स्नान करते हैं। फिर नए कपड़ों में सजते हैं।

उसके बाद गांव के मतवालों की टोली श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम की ओर बढ़ने की तैयारी करती है।

मजेदार बात यह है कि होली खेलने के बाद जो व्यक्ति स्नान कर लेता है, फिर उसके ऊपर कोई रंग नहीं डालता है। यह यहां के लोगों का बड़ा पक्का उसूल है।

होली का असली मेला अब शुरू होता है। जब सौ लोगों की संख्या देखते ही देखते हजारों में पहुंच जाती है।

आपको बता दें कि होली के दिन ककरा स्थित श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम पर भव्य मेला लगता है।

मेला मतलब आठ स्थानीय गांव के लोग एक साथ एक जगह मिलते हैं।

उसके बाद नगाड़ों की धुन पर उछलते-कूदते हैं।

भाग लेने वाले गांवों में कोटवा, जमुनीपुर, बेलवार, तोतापुर, होलीपुर, दुबावल, ककरा और तिवारीपुर शामिल हैं।

सबसे प्रसिद्ध त्योहार

होली के दिन बड़े-बड़े नगाड़ों को बजाते और नाचते-गाते हुए लोग श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम की ओर बढ़ते हैं।

इस भव्य यात्रा की शुरुआत कोटवा गांव से होती है। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, आसपास के लोग शामिल होते जाते हैं।

उसके बाद टोली जमुनीपुर चौराहा पर पहुंचती है। वहां स्थानीय गांव वाले उनके स्वागत में खड़े रहते हैं। ढोल-नगाड़े बजते रहते हैं।

जैसे हो कोटवा वालों की यात्रा आगे बढ़ती है, उनके पीछे जमुनीपुर वाले जुड़ जाते हैं।

यानी जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, रास्ते में आने वाला गांव उस यात्रा के पीछे जुड़ता जाता है।

यह सिलसिला मंदिर पहुंचने तक चलता रहता है।

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अनदेखे रोमांच का अनुभव

कोटवा से यात्रा शुरू होकर, श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम पहुंचने तक का नज़ारा देखकर मन रोमांचित हो उठता है।

देखने पर ऐसा महसूस होता है कि जैसे वाकई में किसी रंग-बिरंगी दुनिया में पहुंच गए हैं।

इतना खुशमिजाज माहौल और रंगीन त्योहार देखने पर ऐसा लगता है कि काश यह वक़्त हमेशा के लिए ऐसे ही चलता रहता।

आश्रम पहुंचने के बाद सबसे पहले कोटवा वाले मंदिर परिसर के सामने बड़े-बड़े नगाड़ों को बजाते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं।

10 से 15 नगाड़ों के बीच लोग तब तक उछलते-कूदते रहते हैं, जब तक शरीर जवाब नहीं दे देता।

थककर चूर हो जाने के बाद लोग मंदिर में विराजमान देवों के देव महादेव यानी शिवलिंग और श्री दुर्वासा ऋषि के दर्शन-पूजन करते हैं।

इसी तरह बारी-बारी आठों गांवों के लोग पहले नगाड़ा प्रदर्शन करते हैं, उसके बाद पूजन-दर्शन करके अपने घर लौट जाते हैं।

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भव्य नगाड़ा प्रतियोगिता का आयोजन

आपको बता दें कि श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम पर आठों गांव के बीच भव्य ‘ढोल-नगाड़ा’ प्रतियोगिता होती।

इस दौरान यह देखा जाता है कि कौन से गांव का प्रदर्शन सबसे शानदार है।

किसकी धुन सबसे लाजवाब है। किसका सुर-ताल सबसे बेहतरीन है।

कौन सबसे ज़्यादा समय तक बेहतर प्रदर्शन किया!

ऐसी ही कई बातों को ध्यान में रखकर एक गांव को विजेता के रूप में चुना और सम्मनित किया जाता है।

इस ‘ढोल-नगाड़ा’ प्रतियोगिता में 10 से 15 लोग एक साथ प्रतिभाग करते हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि बड़े-बड़े नगाड़ों को घंटों तक पीटते रहना आसान नहीं होता।

बजाने वाले बताते हैं कि कुछ समय बाद पता नहीं चलता है कि हाथ हैं भी या नहीं।

किसी-किसी बजाने वालों के हाथ हफ्तेभर से ज़्यादा दुखते हैं।

पिछली प्रतियोगिता में एक नारी शक्ति को बेजोड़ प्रदर्शन करते हुए देखा गया था।

दिलचस्प बात यह है कि ढोल-नगाड़ों के बीच लोग नाचते नहीं, केवल उछलते-कूदते हैं।

हाथ में तलवार या लाठी लेकर!

अपनी क्षमता के अनुसार सबसे महंगे कपड़े पहनकर और सिर पर पगड़ी बांधकर त्योहार में नई जान भर देते हैं।

पिछली साल की होली में पगड़ी बंधवाने के लिए बेलवार गांव के निवासियों ने मध्य प्रदेश के किसी व्यक्ति को बुलाया था।

आन, बान और शान का त्योहार

यहां के स्थानीय लोग होली का त्योहार सबसे अनोखे अंदाज़ में मनाते हैं।

हर त्योहार से बड़ा त्योहार कह सकते हैं आप। ऐतिहासिक होली भी कह सकते हैं।

आपको जानकर यह हैरानी होगी कि होली के दिन यहां के लोग सबसे महंगे और सबसे नए कपड़े को महत्त्व देते हैं।

होली के दौरान आपको शनदार पहनावे का कंपटीशन भी देखने को मिल जाएगा।

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होली के दिन लोग दो बार दो नए कपड़ों का उपयोग करते हैं। पहला कपड़ा तब पहनते हैं, जब श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम जाते हैं।

दूसरे कपड़े का इस्तेमाल तब करते हैं, जब शाम चार बजे से दूसरी भव्य यात्रा निकलती है।

यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि ‘फर्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन’।

कपड़ों में उनकी शान बसती है। फिर उसकी कीमत चाहे जितनी हो!

मिलन की अनोखी यात्रा

श्री दुर्वासा ऋषि आश्रम से घर वापस आने के बाद एक बार फिर शाम चार-पांच बजे से संगम यात्रा निकलती है।

यहां संगम यात्रा का अर्थ लोग नए-नए कपड़े में सज-धजकर लोगों से मिलने के उद्देश्य से निकलते हैं।

उस दौरान लोगों के सिर पर पगड़ी और हाथ में तलवार देखने को मिल जाएगा।

ढोल-नगाड़ा बजता रहेगा और लोग उछलते-कूदते आगे बढ़ते रहेंगे।

उस दरमियान यात्रा जिस-जिस दरवाजे से गुजरती है, लोग उसमें जुड़ते जाते हैं।

मजेदार बात यह कि जिसकी जैसी क्षमता होती है, अपने द्वार पर आने वाले लोगों का स्वागत जरूर करते हैं।

जो लोग हजारों की संख्या को खिलाने-पिलाने की क्षमता रखते हैं, वे अपने द्वार पर नाश्ते, रस-भंगा आदि की व्यवस्था करते हैं।

टोली जहां-जहां से गुजरती है, भीड़ बढ़ती जाती है।

कौन बच्चा? कौन बूढ़ा? सब जवान हो जाते हैं। मस्ती में मस्त हो जाते हैं।

होली के दीवानों की यह अनोखी टोली बेलवार स्थित ‘मां काली धाम’ से लगभग शाम 4-5 बजे के बीच निकलती है और आठ गांवों से होकर गुजरती है।

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इस यात्रा में हजारों लोग बड़े उत्साह के साथ भाग लेते हैं।

दक्षिण कोटवा आदि जैसे गांवों और बाज़ारों से होते हुए टोली जमुनीपुर चौराहा पर ठहरती है।

उस दौरान जमुनीपुर चौराहा को पूरी तरह से सजा दिया जाता है।

लाइट और खानपान की उचित व्यवस्था की जाती है।

सड़क के किनारे आग से नगाड़ों की सिकाई की जाती है।

होली नहीं, हमजोली

शाम के समय एक बार फिर जमुनीपुर चौराहा मस्ती से झूम उठता है।

हजारों लोग एक साथ नगाड़ों की धुन पर थिरकते दिखाई देते हैं।

सड़क पर पब्लिक के अलावा दूर-दूर तक कुछ नज़र नहीं आता है।

रोड किनारे बने घरों की छतों पर भी सिर्फ़ भीड़ ही दिखाई देती है।

जमुनीपुर चौराहा पर लोग घंटों तक नगाड़ों की धुन पर उछलते-कूदते एवं एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं।

इतनी भीड़ में कभी-कभी झगड़ा वाला माहौल भी बन जाता है।

इसलिए कोने-कोने पर पुलिस-प्रशासन तैयार खड़ी रहती है।

ऐसी ही बहुत-सी खूबियां, होली के इस महोत्सव को सबसे प्रसिद्ध त्योहार बनाती हैं।

भारत की प्रसिद्ध होली (Bharat Ki Prasiddh Holi) का आनंद केवल आपको उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के ग्रामीण क्षेत्र में मिलेगा।

इस सबसे प्रसिद्ध त्योहार का असली अनुभव सिर्फ़ वही जानते हैं, जिन्होंने इस रंगीन मेले में हिस्सा लिया है।

यदि अब मन में यह ख्याल आए कि कहां की होली प्रसिद्ध है?

तो जीवन में एक बार प्रयागराज के ककरा-कोटवा में मनाए जाने वाली होली में अवश्य भाग लें।

ककरा-कोटवा कैसे पहुंचें? यह जानने के लिए यह आर्टिकल पढ़ें

प्रयागराज कैसे पहुंचें या और क्या देखें? यह जानने के लिए इस लिंक पर जाएं

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ज्ञानमंच के इस आर्टिकल में आपने जाना – भारत की प्रसिद्ध होली (Bharat Ki Prasiddh Holi) यानी कहां की होली प्रसिद्ध है और क्यों यह सबसे प्रसिद्ध त्योहार है?

होली का वीडियो यहां देखें

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