Bhimashankar Jyotirlinga: अद्भुत महिमा, रहस्यमयी स्थान

Bhimashankar Jyotirlinga, Maharashtra: अगर आप श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दिव्य दर्शन के लिए प्लान बना रहे हैं, तो यह आर्टिकल आपकी पूरी मदद कर सकता है। इसमें वह हर जानकारी मौजूद है, जो ट्रिप पर जाने से पहले आप जानना चाहते हैं। जैसे कि महाराष्ट्र में श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग किस जगह विराजमान हैं। मुंबई या पुणे शहर से मंदिर की दूरी कितनी है अथवा कैसे जाएं। ज्योतिर्लिंग के पास होटल कहां लिया जाए।

ऐसी ही अन्य कई महत्वपूर्ण जानकारी के लिए पढ़िए, ज्ञानमंच की भक्ति और रोमांच भरी यात्रा की दास्तान, जो आपका सफर बेहद आसान और दिलचस्प बना देगी।

सबसे पहले हम श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने की कहानी एवं इतिहास के बारे में जानेंगे।

श्री भीमाशंकर की कहानी, पुजारी मंगेश की जुबानी

श्री भीमाशंकर महादेव के दिव्य दर्शन के बाद, मैंने मंदिर के निकास द्वार पर काल-भैरव बाबा की सेवा में समर्पित पुजारी श्री मंगेश जी से जानकारी जुटाने के लिहाज से पूछा कि क्या भगवान भीमाशंकर के बारे में कुछ जानकारी मिल सकती है?

मेरे इस सवाल पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा – “जी, बिल्कुल मिल जाएगी।”

मेरा सबसे पहला सवाल यह था कि क्या श्री भीमाशंकर महादेव यहां साक्षात प्रकट हुए हुए थे? इस पर उन्होंने बड़े गर्व से क्या कहा? चलिए जानते हैं:

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

पुजारी मंगेश जी ने जो कहानी मुझे सुनाई, वो मैं आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूं।

उनके द्वारा सुनाई कई दास्तान से पहले, मैं आपको इस बात से रूबरू करा दूं कि श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का वर्णन पवित्र ग्रंथ श्री शिव पुराण में मिलता है।

यह कहानी युगों पुरानी है। विद्युन्माली, तारकक्ष और वीर्यवान नामक तीन अजेय वरदानी पृथ्वी यानी भीमाशंकर वन में निवास करते थे।

तब इस स्थान को त्रिपुरासुर की ‘त्रिपुरा नगरी’ के नाम से जाना जाता था।

हजारों वर्षों की कठिन तपस्या की बदौलत तीनों राक्षसों को भगवान ब्रह्मदेव जी से ‘अजेयता’ का वरदान प्राप्त हुआ था।

एक ऐसा वरदान, जो तीनों राक्षसों की नज़रों में अजेय था।

विद्युन्माली, तारकक्ष और वीर्यवान को एक साथ त्रिपुरासुर के नाम से जाना जाता था।

वरदान में उन्होंने भगवान ब्रह्मदेव जी से देवताओं द्वारा निर्मित तीन अति-सुरक्षित, सुंदर और भव्य किलों के निर्माण का वरदान मांगा, जो हर हाल में ‘अजेय’ हो।

अजेय किले का निर्माण

Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra: भगवान ब्रह्मा जी उन्हें तीन किले (Forts) वरदान स्वरूप देने के लिए तैयार हो गए, लेकिन एक शर्त उन्होंने भी रख दी।

उन्होंने कहा कि इन किलों को एक तीर से एक बार में ध्वस्त किया जा सकेगा। उसके बाद, भगवान ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार, सोने, चांदी और लोहे से तीन ‘अजेय किले’ बनाए गए।

तब ये किले एक साथ मिलकर ‘त्रिपुरा’ के नाम से जाने जाते थे। कुछ लोग आज भी इसे ‘त्रिपुरा’ ही बुलाते हैं।

त्रिपुरा असुर सेना की निवास स्थली हुआ करती थी।

वरदान के घमंड में चूर त्रिपुरासुर अपनी दिव्य शक्तियों का गलत इस्तेमाल करने लगे। कमजोरों, भगवान के भक्तों और देवताओं को सताने लगे।

उनके शैतानी कारनामों से पृथ्वी ही नहीं, तीनों लोक के वासी कांपने लगे। दसों दिशाओं में हाहाकार मच गया।

जब हर तरफ लहू पानी की तरह बहने लगा और पाप अपनी चरम-सीमा पर थी, फिर देवों के देव महादेव को आना ही पड़ा।

आखिर सवाल भक्तों की सुरक्षा और पृथ्वी की रक्षा का था।

अर्ध-नारायण-नटेश्वर हुए प्रकट

Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra: ऐसे में भगवान शिव और माता पार्वती ने सृष्टि के कल्याण के लिए अर्ध-नारायण-नटेश्वर यानी अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुए।

उन्होंने त्रिपुरासुर के अंत के साथ-साथ उसकी त्रिपुरा नगरी (तीन किला) भी सदा के लिए मिट्टी में मिला दिया।

त्रिपुरासुर के आतंक से जब संसार सुरक्षित हुआ, तो देवताओं और ऋषि-मुनियों ने ‘अर्धनारीश्वर’ भगवान की विधिवत् पूजा-पाठ की।

साथ ही, भक्तों की सुरक्षा और कल्याण के लिए इस स्थान (भीमाशंकर वन) पर सदैव निवास करने की प्रार्थना की।

इस प्रकार, देवताओं और ऋषि-मुनियों की विनती पर भगवान शिव और माता पार्वती भीमाशंकर वन में एक ‘लिंग’ स्वरूप से सदा के लिए निवास करने लगे।

भीमाशंकर वन में निवास स्थली होने के कारण आगे चलकर इन्हें श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाने लगा।

इस पवित्र स्थली से कुछ दूरी पर ‘भीमा’ नामक नदी बहती है।

कहा जाता है कि त्रिपुरासुर से युद्ध के दौरान, थकान की वजह से ‘अर्धनारीश्वर’ भगवान के शरीर से निकलने वाले पसीने से एक नदी निर्मित हुई थी।

उस पावन नदी को आज ‘भीमा नदी’ के नाम से जाना जाता है।

यही नदी आगे जाकर ‘कृष्णा’ नदी में मिल जाती है।

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की महिमा

भारत-भर में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हैं। जिनमें, श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra) छठा ज्योतिर्लिंग हैं।

इस अलौकिक लिंग में भगवान शिव और माता पार्वती एक साथ निवास करते हैं।

यह दिव्य ज्योतिर्लिंग दो भागों में विभाजित है।

एक भाग में भगवान भोलेनाथ और दूसरे हिस्से में माता पार्वती निवास करती हैं।

इस ज्योतिर्लिंग के दिव्य दर्शन के दौरान मैंने देखा कि इस पवित्र शिवलिंग का ऊपरी भाग एक पतली रेखा द्वारा विभाजित है।

ऐसी मान्यता है कि यह भगवान शिव और माता पार्वती के अर्धनारीश्वर स्वरूप का प्रतीक है।

यानी ज्योतिर्लिंग का आधा भाग भगवान शिव और आधा हिस्सा माता पार्वती को चिन्हित करता है।

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से लाभ

Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra: त्रिपुरासुर के वध के समय भगवान शिव का अद्भुत स्वरूप देखकर समस्त देवगण और ऋषि-मुनि चकित रह गए थे।

उन्होंने माता पार्वती और भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की विधिवत् पूजा-अर्चना की।

उनके अनुरोध पर भगवान शिव और माता पार्वती जग-कल्याण के लिए ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने लगे।

शास्त्रों में भीमाशंकर वन और इसके क्षेत्रों को बहुत पवित्र माना गया है।

भगवान शिव और माता पार्वती के निवास स्थान की वजह से यह तीर्थस्थल परम पुण्य देने वाला स्थान है।

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएंं पूरी होती हैं।

सभी पापों से मुक्ति और समस्त दु:खों से छुटकारा मिलता है। जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की बढ़ोतरी होती है।

मंदिर की बनावट, आकर्षण का केंद्र

काले पत्थर की दीवार पर सदियों से स्थित श्री भीमाशंकर मंदिर (Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra) की बनावट बेमिसाल है।

दीवार की हर इंच पर अद्भुत कारीगरी और बेजोड़ नक्काशी दिखती है।

नागर शैली की वास्तुकला से निर्मित श्री भीमाशंकर मंदिर की बनावट में नई और पुरानी शैली का बेजोड़ संगम दिखाई देता है।

गूगल पर सर्च के दौरान मिली जानकारी के अनुसार, इस भव्य मंदिर के निर्माण का श्रेय मराठा साम्राज्य के संस्थापक वीर शिरोमणि श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज जी को जाता है।

उनके शासनकाल के दौरान मंदिर की पूजा और रखरखाव का सारा खर्च उन्हीं के द्वारा उठाया जाता था।

माना जाता है कि भारतवर्ष के अमर गौरव, हिन्दू धर्म रक्षक, हिन्दू हृदय सम्राट, वीर मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज जी श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन के लिए अक्सर आया करते थे।

पेशवाओं के काल में मराठा साम्राज्य के प्रभावशाली मंत्री व कुशल कूटनीतिज्ञ नाना फड़नवीस ने सभामंडप और शिखर बनवाकर मंदिर को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया था।

सुनहरे इतिहास का प्रमाण

मंदिर के ठीक सामने एक विशाल घंटा बंधा हुआ है, जो भक्तों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

श्री भीमाशंकर महादेव (Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra) के दर्शन के बाद, अक्सर लोग घंटे के पास फोटोग्राफी करते नज़र आते हैं।

वह घंटा देखने में जितना बड़ा और आलीशान है, वजन में उतना ही भारी है।

घंटे पर अंकित सन के अनुसार, यह घंटा श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रथम के छोटे भाई वीर चिमाजी के अद्भुत पराक्रम की निशानी है।

कहा जाता है कि सन 1727 में वीर चिमाजी ने पुर्तगालियों को पराजित करके वहां के चर्च से यह घंटा लाए थे।

पुर्तगालियों के विरुद्ध उस युद्ध को उन्होंने वसई किले से लड़ा था।

इस घंटे में जीसस के साथ-साथ मदर मैरी की मूर्ति बनी है और 1727 लिखा हुआ है।

मनमोहक वातावरण, अद्भुत अनुभव

सीढ़ियों से उतरते हुए जब हम मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, तो सीढ़ियों के पास ही सबसे पहले श्री शनि भगवान के दिव्य दर्शन होते हैं।

उसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए भक्त आगे बढ़ते हैं, तो सबसे पहले मंदिर के दरवाजे के ठीक सामने भगवान शिव के प्रिय गण भव्य स्वरूप में नंदी जी स्थापित हैं।

नंदी जी का आकार काफी बड़ा और आकर्षक है।

नंदी जी के दर्शन, पूजन और कानों में मन की मुराद कहने के बाद श्रद्धालु मंदिर के अंदर यानी मुख्य गर्भगृह में प्रवेश करते हैं।

जहां चांदी के वस्त्र से अलंकृत श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दिव्य दर्शन होते हैं। शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं।

मन की कामना या घर की सुख-शांति के लिए मंदिर में मौजूद पुजारी से पूजा-अर्चना आदि कराई जा सकती है।

खुशी की बात यह कि श्री भीमाशंकर मंदिर में भक्तों को ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक करने की आज़ादी मिलती है।

लेकिन ध्यान रहे, जल के अलावा दूध, दही और घी आदि चढ़ाना सख्त मना है।

पूजा के लिए आप अपने साथ जल, फूल, बेलपत्र, आदि ले जा सकते हैं।

श्री भीमाशंकर मंदिर परिसर में भगवान शिव के गण नंदी की दो बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित हैं। दोनों मूर्तियां अगल-बगल एक साथ विराजित हैं।

इसके अलावा, मंदिर परिसर के पास ही भगवान श्री राम और भगवान दत्त के मंदिर स्थापित हैं।

मंदिर के पीछे की तरफ ‘मोक्षकुण्ड और ज्ञानकुण्ड’ नाम के दो कुण्ड हैं।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग आरती का समय

बाबा भोलेनाथ की सेवा में समर्पित पुजारी जी ने बताया कि हर दिन प्रातः 5 बजे श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra) की पहली आरती के साथ मंदिर का कपाट महादेव के भक्तों की पूजा-अर्चना एवं दर्शन के लिए खोल दिया जाता है।

सुबह से रात के बीच तीन बार भगवान शंकर की आरती की जाती है।

आरती, अभिषेक व दर्शन की समय-सारणी

प्रातः 4.30 बजे काकड आरती । प्रातः 5.00 बजे निजरूप दर्शन

सुबह 5.30 बजे से नियमित पूजा व अभिषेक

दोपहर 12.00 बजे नैवेद्य पूजा | दोपहर 12.30 बजे से नियमित पूजा व अभिषेक |

अपराह्न 3.00 बजे मध्यान आरती | 3.30 बजे श्रृंगार |

शाम 7.30 बजे नियमित आरती |

रात्रि 9.00 बजे मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है।

श्री भीमाशंकर मंदिर कहां स्थित है?

हर तरफ गगनचुंबी पहाड़ है और उसकी गोद में स्थित है श्री भीमाशंकर मंदिर।

वो पहाड़, जो हरियाली की चादर से पूरी तरह ढके हुए हैं।

सिर से पांव तक हरे-भरे पेड़ों की मालाएं। जहां तक नज़र देख सकती है, सिर्फ़ हरियाली ही हरियाली दिखती है।

यहां पर्वतों के शिखर देखना, आसमान देखने के समान है।

भौगोलिक स्थिति

श्री भीमाशंकर मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

यानी बस, टैक्सी या निजी वाहनों से सफर करते समय लगभग 40 किमी केवल पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है।

मंदिर समतल भूमि से लगभग 40 किमी ऊपर सह्याद्री के हरे-भरे पहाड़ों में स्थित है।

मुझे लगता है कि यहां का मुख्य बाज़ार (चाकण, पुणे) लगभग 60-80 किमी की दूरी पर स्थित है।

भीमाशंकर वन में चारों तरफ सिर्फ़ पर्वत-माला दिखाई देती है।

बीच-बीच में छोटे-छोटे गांव और छोटी-मोटी चाय-नाश्ता की दुकानें दिख जाती हैं।

मंदिर से 10-12 किमी पहले कुछ बड़े होटल और रेस्टोरेंट के बोर्ड सड़क पर दिखाई देते हैं।

पहाड़ की चढ़ाई थोड़ी कठिन है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए कई खतरनाक मोड़ों से गुजरना पड़ता है।

रोड सिंगल है, पर काफी चौड़ी और बेहतर है। दो बड़ी गाड़ियां बड़े आराम से आती-जाती हैं।

ठंड और बरसात के मौसम में सुबह और रात के वक़्त का सफ़र थोड़ा ज़्यादा चुनौतीपूर्ण रहता है।

बरसात के मौसम में बादलों के झुंड और ठंडी के मौसम में घने कोहरे का छाया सारा रास्ता घेर लेता है।

कहानी स्थानीय निवासी की जुबानी

इन चुनौतियों की वजह से मंदिर के आस-पास कारोबार करने वाले छोटे व्यापारी और स्थानीय लोगों का जीवन समतल भूमि पर रहने वालों की तुलना में कई गुना ज़्यादा कठिन है।

पहाड़ी लाइफ क्या होती है? यह कुछ दिन यहां बिताकर जान सकते हैं।

हर दिन कठिनाइयों का सामना करते हुए स्थानीय निवासी, श्री भीमाशंकर महादेव के भक्तों और श्रद्धालुओं की सेवा में समर्पित हैं, उनके इस जज़्बे को नमन है।

दिसंबर का महीना था। सुबह 8 बजे ठंड से बदन कांप रहा था।

मंदिर के पास होटल की सुविधा न होने की वजह से महादेव के दर्शन के लिए आए भक्त, सौ-सौ रुपए देकर एक ‘होमस्टे’ में स्नान आदि कर रहे थे।

उस पतरे वाले घर में चार-पांच कमरे थे, जो पूरी तरह से बुक थे।

कुछ लोग नहाने के बाद, बरामदे में ही खड़े-खड़े तैयार हो गए।

हम 6 लोग थे; तीन लेडीज और 3 जेंट्स।

सीमित रूम की उपलब्धता के बावजूद, कई जगह पूछने पर एक रूम हमें बड़ी मुश्किल से मिला।

कीमत 800 रुपए। समय सिर्फ़ डेढ़ घंटे। शौचालय और स्नान की सुविधा कमरे के बाहर थी।

मिले समय के अनुसार, सब फटाफट तैयार होने में व्यस्त हो गए।

इस दौरान, मैंने देखा कि घर की मालकिन लकड़ी की अग्नि से चलने वाली एक आधुनिक मशीन पर पानी उबाल रही थीं।

लेडी ठंडा पानी एक जग से उठाकर मशीन के मुखाने (मुंह) में डाल रही थीं और नीचे से पानी गर्म होकर बाहर निकल रहा था। इतना गर्म, शायद गीजर से ज़्यादा।

जिज्ञासा को मिला करारा जवाब

लकड़ी की जल गर्म करने वाली मशीन देखकर, मैंने मकान मालकिन से पूछा कि “लकड़ी जलाने से अच्छा आप गीजर क्यों नहीं लगवा लेतीं? आपका बहुत समय बच जाएगा।”

मेरे इस सवाल का उन्होंने बड़ी गंभीरता से उत्तर दिया – “यह पहाड़ी इलाका है भैया। यहां, कभी-कभी 8-8 दिन तक बिजली नहीं आती है। ऐसे में गीजर का क्या काम?”

मैं कुछ नहीं बोला। नहाने के लिए स्नानघर में चला गया। मैडम ने नहाने के लिए दो छोटी-छोटी पानी से भरी बाल्टियां दी थीं।

एक में ज़्यादा ठंडा पानी था, एक में बहुत ज़्यादा गर्म। दोनों पानी को एक ही जग में मिक्स करके नहाना था, जो कि बेहद ही चैलेंजिंग काम था। ठंडा पानी जल्दी खत्म हो गया।

गर्म पानी आधा से ज़्यादा बचा था। मैंने मैडम से कहा- “एक बाल्टी ठंठा पानी मिल सकता है क्या?”

इस पर उन्होंने कहा – “मिल जाएगा, पर एक बाल्टी पानी का एक्स्ट्रा चार्ज लगेगा।”

मैंने कहा – “कितना?”

उन्होंने कहा – “50 रुपए!”

मैंने हैरानी से पूछा – “50 रुपए? यह कुछ ज़्यादा नहीं हुआ?”

मैडम ने कहा – “पैसा सिर्फ़ पानी का लेती हूं, कमरे का नहीं! यह पानी बड़ी मुश्किल से यहां तक पहुंचता है।”

उनका कहने का मतलब था कि यह पानी कई किलोमीटर पहाड़ों के सीने पर पैदल चलकर पहुंचता है।

इस तरह, महादेव के उस पावन दरबार में मैंने एक बार फिर ‘पानी के महत्त्व’ को बड़ी गहराई से समझ पाया।

क्या खाएं? कहां खाएं?

पर्वतीय क्षेत्र और कम जगह होने की वजह से श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के निकट शहरों की तरह बेहतरीन रेस्टोरेंट आदि उपलब्ध नहीं हैं।

लेकिन हां, मंदिर के आसपास कई नाश्ते और भोजन की छोटी-मोटी दुकानें मौजूद हैं।

उन दुकानों में आप नाश्ते के रूप में वडापाव, साबूदाना वड़ा आदि से पेट पूजा कर सकते हैं।

भोजन के रूप में महाराष्ट्रीयन और साउथ इंडियन थाली का लुफ्त उठा सकते हैं।

क्या खरीदें?

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra) देवों के देव महादेव की नगरी है।

भगवान भोलेनाथ रुद्राक्ष की माला पहनते हैं। माथे पर चंदन लगाते हैं। डमरू बजाते हैं।

इसलिए यहां, भगवान शिव से संबंधित हर चीज़ मिलती है।

इसके अलावा, पूजा-पाठ की सामग्री और प्रसाद के रूप में ‘मलाई पेड़ा’ आदि खरीद सकते हैं। मंदिर परिसर के अंदर, मंदिर ट्रस्ट द्वारा बनाई सुगंधित और प्राकृतिक अगरबत्ती और धूपबत्ती मिलती है।

अगरबत्ती स्टॉल पर खड़े दुकानदार (मंदिर ट्रस्ट कर्मचारी) ने बताया कि यह अगरबत्ती पूरी तरह से प्राकृतिक है।

इन अगरबत्तियों को श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga) पर चढ़ने वाले ‘बेलपत्र’ से बनाया जाता है।

सेहत के लिहाज से बढ़िया और सुगंध भी अच्छी है। अगरबत्ती से निकलने वाले धुएं आंखों में नहीं लगते हैं।

‘त्रिनेत्र’ नामक यह अगरबत्ती ‘श्री क्षेत्र भीमाशंकर संस्थान’ द्वारा श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर से निकलने वाले ‘पवित्र अपशिष्ट’ से बनाई जाती है।

एक पैकेट की कीमत 50 रुपए हैं, जिसमें कुल 43 अगरबत्ती की तीलियां रहती हैं।

आजमाने के उद्देश्य से मैंने आधे दर्जन अगरबत्ती के पैकेट खरीदें, जो मेरी उम्मीदों पर खरी उतरीं।

खुशबू भी अच्छी देती है और बड़ी आसानी से जलने लगती है। केवल जलती तीली दिखाने पर।

कहां ठहरें?

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के पास ठहरने के लिए बेहतर होटल की सुविधा मौजूद नहीं है।

रूम की उपलब्धता होने पर ‘होमस्टे’ में ठहर सकते हैं। व

हां आपको बेहतर सुविधा तो नहीं, पर घर जैसा अहसास मिल सकता है।

अगर आप हसीन वादियों की गोद में बसे आलीशान होटल का अद्भुत अनुभव उठाना चाहते हैं, तो एमटीडीसी (महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम) के होटल में स्टे कर सकते हैं।

उस होटल में आपको वह सारी मूलभूत और आवश्यक सुविधाएं मिल जाएंगी, जो एक होटल में आप चाहते हैं।

एमटीडीसी भीमाशंकर होटल से श्री भीमाशंकर मंदिर की दूरी (MTDC to Bhimashankar Jyotirlinga Distance) लगभग 8-10 किमी है।

होटल से मंदिर जाने के लिए समय-समय पर बस मिल जाती है। पर, सबसे बेस्ट ऑप्शन खुद की निजी गाड़ी है।

अगर आप खुद के साधन से आते-जाते हैं, तो उस स्थान को अलग अंदाज़ से देख सकते हैं।

कई स्थानों पर यादों के तौर पर सेल्फी और फोटो खींच सकते हैं।

कई हसीन और रंगीन यादों को सदा के लिए कैप्चर कर सकते हैं।

भीमाशंकर एमटीडीसी होटल ऑनलाइन इस लिंक के जरिए बुक किया जा सकता है। इ

सके अलावा, 20-10 किमी के दायरे में हरे-भरे वनों के बीच कई प्राइवेट ‘जंगल होटल’ मिल जाएंगे।

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के निकट होटल MakeMyTrip, Goibibo, Booking.com और Tripadvisor आदि के जरिए भी बुक किए जा सकते हैं।

मुंबई से श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कैसे जाएं?

मुंबई से श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की दूरी लगभग 230 किमी है। यहां से प्राइवेट बस की सुविधा मौजूद नहीं है।

पर, कुर्ला पश्चिम से MSRTC (एसटी महामंडल) की तीन बसें श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga Maharashtra) के लिए निकलती हैं।

MSRTC की यह तीनों बसें सुबह 06:30 बजे, 07:00 बजे और 11:00 बजे छूटती हैं।

इन बसों का विवरण इस लिंक पर देखा जा सकता है।

श्री भीमाशंकर मंदिर से मुंबई के लिए केवल एक ही बस सेवा मौजूद है।

यह बस हर दिन सुबह 10:30 बजे छूटती है और 15:45 बजे पनवेल तथा 17:30 बजे नेहरू नगर, कुर्ला छोड़ देती है।

सबसे बेहतरीन विकल्प है। खुद का साधन या किराये पर कार आदि हायर कर लेना।

मुंबई से श्री भीमाशंकर मंदिर की दूरी खुद के साधन से पांच घंटे में तय की जा सकती है।

रात के वक़्त सड़क मार्ग द्वारा जाने के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग वाया लोनावला-खंडाला-चकाण है।

हम इसी रास्ते से गए और आए थे।

पुणे से बस द्वारा कैसे पहुंचें?

पुणे से श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की दूरी लगभग 112-125 किमी है।

यहां से मंदिर के लिए हर सुबह 05:00 बजे से दोपहर 13:00 बजे के दरमियान MSRTC की कई बसें छूटती हैं।

पुणे से लगभग 3 घंटे 25 मिनट में यह सफ़र तय किया जा सकता है।

बसों की सूची इस लिंक पर देखी जा सकती है।

फ्लाइट द्वारा कैसे पहुंचें?

यदि आप भारत या दुनिया के किसी अन्य कोने से श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दिव्य दर्शन के लिए पहुंचना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको पुणे एयरपोर्ट पर लैंड करना होगा।

पुणे इंटरनेशनल एयरपोर्ट से श्री भीमाशंकर मंदिर की दूरी MHSH 112 से होकर लगभग 118.4 किमी है।

जिसे टैक्सी या कार द्वारा लगभग 4 घंटे में तय किया जा सकता है।

ट्रेन द्वारा कैसे पहुंचें?

यदि आप ट्रेन द्वारा श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन के लिए आना-जाना चाहते हैं, तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पुणे है।

यहां से बस, टैक्सी, कार आदि हायर कर सकते हैं।

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