Chandrashekhar Azad: सही ज्ञान, दिलाए सम्मान

Chandrashekhar Azad ki Kahani: सबसे पहले भारत माता के सभी अमर शहीदों को शत्-शत् नमन। आज़ादी के अमृत महोत्सव पर पढ़िए, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की अमर कहानी।

जो मन से ख़ुद को आज़ाद मान ले, फिर उसे कौन गुलाम बना सकता है?

सोने की चिड़िया भारत, गुलामी के जंजीरों से जकड़ी हुई थी।

ना जाने कितने मासूम भारतीय अपनी जान गंवा चुके थे।

महिलाओं पर अत्याचार की सीमा चरम पर थी।

भारत का विनिर्माण क्षेत्र पूरी तरह तहस-नहस हो चुका था।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पांव पसारते ही भारतीय उद्यमियों की कमर तोड़ दी थी।

हर भारतीय को आमदनी से ज़्यादा टैक्स के बोझ ने दबा रखा था।

चारों तरफ अन्याय, घोर अपराध और नरसंहार के बादल छाए हुए थे।

ऐसे में 23 जुलाई, 1906 को भारत माता के वीर सपूत अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म हुआ।

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म

Chandrashekhar Azad ki Kahani: बात 23 जुलाई, 1906 की है। उस दिन बरसात का सुहावना मौसम था।

मध्य प्रदेश के झबुआ जिले के भाभरा गांव में एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया – पंडित चंद्रशेखर तिवारी।

जिन्हें आज हम अमर शहीद ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ के नाम से पूजते हैं!

आज़ाद जी के जन्म होने से पहले उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिला के बदरका गांव में रहते थे।

उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी जी शांत स्वभाव के धनी थे।

पंडित जी एक तरफ गुलामी से लड़ रहे थे और दूसरी ओर अकाल की मार से लाचार थे।

पापी पेट को पालने के लिए बदरका से मध्य प्रदेश आ बसे।

कुछ दिन अलीराजपुर रियासत में नौकरी की। फिर भाभरा गांव के स्थाई निवासी बन गए।

बचपन में सीखें बड़े कारनामे

Chandrashekhar Azad ki Kahani: भाभरा गांव की मिट्टी में खेल-कूदकर आज़ाद बड़े हुए।

मां जगरानी देवी के लाडले बेटे, माता-पिता की नज़रों में बड़े भाई सुखदेव से ज़्यादा प्यारे।

बचपन आदिवासी मित्रों के साथ बीता यानी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में जंगल के रोमांच के बीच।

भील बालकों की मित्रता ने धनुष-बाण चलाने और बेजोड़ निशानेबाजी की कला सीखा दी थी।

बचपन से ही पक्के निशानेबाज थे आज़ाद।

मां जगरानी देवी बेटे को संस्कृत का महान विद्वान बनाना चाहती थीं, लेकिन बेटे को महान क्रांतिकारी बनना था।

आज़ाद को बचपन से पढ़ाई के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं था।

उन्हें और भाई सुखदेव को पढ़ाने पिता के करीबी मित्र, पंडित मनोहर लाल त्रिवेदी जी आते थे।

शुरुआती शिक्षा के वही उनके मास्टर साहब थे।

आज़ाद को संस्कृत में निपुण बनाने के लिए माता ने काशी विद्यापीठ, बनारस (वाराणसी) भेज दिया।

संस्कृत पाठशाला में दाखिला हुआ। माता-पिता की नज़रों में पढ़ाई करने लगे।

गुलामी के उस दौर में जैसे-जैसे समय बीता, आज़ाद बड़े होते गए; तन-मन और देशभक्ति के विचारों के साथ।

देश सेवा का जज़्बा बचपन से ही लहू में था। चढ़ती जवानी में आज़ादी दीवानगी बनकर उबलने लगी।

जलियांवाला बाग की आग

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में खुलेआम नरसंहार हुआ।

जिसकी चीख, भारत के इतिहास के पन्नों पर सदा काली स्याही की तरह अमर रहेगी।

उस नृशंस हत्या से रो पड़ा था भारत माता का दिल।

कई महीनों तक पूरे भारत में सिर्फ़ मौत का शोक फैला रहा।

सालों तक न कोई उत्सव मना और न ही किसी अन्य खुशी का महोत्सव।

शांतिपूर्ण विरोध के बदले ब्रिगेडियर जनरल डायर के जालिम सिपाहियों ने निहत्थी भीड़ को गोलियों से भून दिया था।

ब्रिटिश राज के रिकॉर्ड के अनुसार, इस घटना में 379 लोगों के शहीद और 200 लोगों के घायल होने की बात कही गई थी।

अनाधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1,000 से अधिक लोग शहीद और 2,000 से अधिक लोग घायल हुए थे।

इस नरसंहार ने देश के अन्य क्रांतिकारियों के साथ-साथ आज़ाद को भी झकझोर दिया था।

इस नरसंहार से 14-15 साल के यंग स्टूडेंट का खून उबलने लगा था।  

1920 पहली बार सड़क पर धरना-प्रदर्शन

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: धीरे-धीरे एक साल बीत गया।

जलियांवाला बाग के नरसंहार जैसी और कई दर्दनाक घटनाएं घटीं।

फिर उन घटनाओं से महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में ‘असहयोग आंदोलन’ का जन्म हुआ।

इधर ‘असहयोग आंदोलन’ का फरमान जारी हुआ, उधर प्रतिशोध की आग ज्वालामुखी बन गई।

आज़ाद अपने युवा क्रांतिकारी सहपाठियों के साथ सड़क पर धरना-प्रदर्शन करने उतर गए।

यह जीवन में पहली बार था, जब ‘आज़ाद’ को अंग्रेज़ सिपाहियों ने ‘कैद’ किया था।

अंग्रेजों के कानून तोड़ने यानी सड़क पर धरना-प्रदर्शन के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया।

उम्र 14-15 साल के करीब थी, लेकिन हौसला फौलाद की तरह मजबूत था।

लहू में भगवान श्री परशुराम की तरह उबाल था।

अदालत में पेशी के दौरान जज साहब ने अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद से पूछा- “क्या नाम है तुम्हारा? कहां के रहने वाले हो?”

आज़ाद साहब ने गर्व से कहा- “मेरा नाम ‘आज़ाद’ है! पिता का नाम ‘स्वतंत्र’ और ‘जेल निवास स्थान’ है।”

ऐसे बेतुके जवाब से जज साहब को गुस्सा आया और 15 कोड़ों की सजा सुना दी।

कई कोड़े पड़े। अपमान का जहर पीना पीड़ा।

जितनी बार निर्दयी अंग्रेज सिपाही उन पर कोड़े बरसाते, उतनी बार उनके मुंह से निकलता-“भारत माता की जय!”

कठोर दंड से इरादे हुए बुलंद

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: बदन की नाजुक चमड़ी उधेड़ उठी, लेकिन आवाज़ में बुलंदी वही थी- “भारत माता की जय!”

जेल गए, कठोर दंड पाएं; इरादा और मजबूत हुआ।

साहस के साथ देश प्रेम का जज़्बा और गहरा हो गया।

इस ऐतिहासिक घटना के बाद से पंडित चंद्रशेखर तिवारी अब आज़ाद’ के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे।

फिलहाल उनके क्रांतिकारी साथी उन्हें ‘पंडित जी’ ही बुलाते थे।

आज़ादी के सपने को पलकों पर सजाए अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद अब उत्तर भारत के क्रांतिकारी-कार्य दल के बड़े नेता बन चुके थे।

अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ उन्होंने कई बार अंग्रेजों को नाकों-चने चबवाएं।

आज़ाद ने अपने नेतृत्व में कई देश भक्तों को आज़ादी के आंदोलन में शामिल किया।  

1922 – नए दौर की शुरुआत  

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: महात्मा गांधी जी और आज़ाद की विपरीत विचार-धाराओं ने दोनों का रास्ता अलग कर दिया।

आज़ाद असहयोग आंदोलन से निकलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ से जुड़ गए।

इसमें इनकी मदद युवा अमर क्रांतिकारी प्रणवेश चटर्जी जी और मन्मथनाथ गुप्त जी ने की।

उस समय हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक भारत के अमर क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी थे।

जलते हुए दीपक पर अपना हाथ रखकर जब अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद ने भारत माता को स्वतंत्र कराने की शपथ ली थी, तब दीपक की लौ से हाथ की त्वचा जल गई, पर मुंह से उफ नहीं निकला।

उनकी यह दिलेरी देखकर बिस्मिल जी चकित रह गए थे।

इस टेस्ट को पास करने के बाद अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को नई बुलंदी पर पहुंचाने में जुट गए।

नए भारत के निर्माण के लिए संस्था का चलना जरूरी था।

संस्था को चलाने के लिए पैसों की ज़रूरत थी।

ऐसे में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की तिजोरियों को लूटने का फैसला लिया।

9 अगस्त, 1925 – काकोरी कांड को दिया अंजाम

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: रात के वक़्त लखनऊ के काकोरी और आलमनगर रेलवे स्टेशन के बीच, सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन की चेन खींचकर रोक दी गई।

अमर शहीद अशफाक उल्ला खां जी के नेतृत्व में चेन पुलिंग को अंजाम अमर क्रांतिकारी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी जी ने दिया।

इधर ट्रेन रुकी, उधर क्रांतिकारियों का दल ब्रि‍ट‍िश सरकारी खजाने पर टूट पड़ा।

इसमें महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी, अशफाक उल्ला खां जी, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी जी, ठाकुर रोशन सिंह जी और अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी सहित 10 वीर क्रांतिकारी शामिल थे।

इस घटना को दुनिया ‘काकोरी कांड’ के नाम से जानती है, जिसने गोरी सरकार पर करारा प्रहार किया था।

इस कांड से एक तरफ ब्रिटिश सरकार पर नई चुनौतियों का कहर बरसा, तो दूसरी ओर नए क्रांतिकारियों का हौसला बढ़ा।

लेकिन, काकोरी कांड के बाद दल के कई सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और कई को फांसी की सजा दी गई।   

19 दिसंबर, 1927 – शुरू हुआ बलिदान का खेल

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जी गोरखपुर जेल में, अशफाक उल्ला खां जी फैजाबाद जेल में और ठाकुर रोशन सिंह जी इलाहाबाद जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।

इस तरह यह दल बिखर गया। मुख्य बुनियाद हिल गई।

अब दल को जिंदा करने की ज़िम्मेदारी आज़ाद के कंधों पर आ पड़ी।

पंडित अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद प्रखर देशभक्त थे।

शरीर से मजबूत और दिमाग से तेज थे।

काकोरी कांड के बाद फरार आज़ाद, कभी साधु, कभी कोई और वेश बनाकर, अंग्रेज पुलिस की आंख में धूल झोंककर बचते रहें। 

संस्था की नींव मजबूत करते रहें। इतने बड़े कांड के बाद भी आज़ाद अंग्रेज पुलिस की चंगुल से आज़ाद थे।

अंग्रेजों की आंखों से निकलकर दिल्ली पहुंच चुके थे।

सभा के जरिए एक बार आज़ादी के दीवानों को जगा रहे थे।

क्रांतिकारियों की उस महासभा में भारत माता के वीर सपूत, अमर शहीद, महान बलिदानी भगत सिंह जी भी शामिल थे।

एक बार फिर दिल्ली से ताक़त मिली और नए नाम से नए दल का गठन हुआ।

आज़ादी की लड़ाई एक बार फिर तेज हो गई।

नए दल का नाम ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ रखा गया।

इस संस्था के कमांडर इन चीफ अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को बनाया गया।

17 दिसंबर, 1928 – लाहौर में लिया खून का बदला

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: शाम के समय अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने पुलिस अधीक्षक के ऑफिस को घेर रखा था।

लाला लाजपतराय के खून का बदला लेने के लिए।

जेपी सॉन्डर्स जैसे हैवान को मौत के घाट उतारने के लिए।

जॉन सॉन्डर्स जैसे ही अपने बॉडीगार्ड के साथ मोटर साइकिल पर सवार होकर निकला, शहीद राजगुरु जी की बंदूक से निकली गोली सीधी उसकी खोपड़ी में जा लगी।

वह मोटर साइकिल के साथ ज़मीन में घसीट उठा।

उसके बाद शहीदे-आजम भगत सिंह ने जेपी सॉन्डर्स और अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद ने उसके अंगरक्षक को मौत की सजा देकर, लाला लाजपतराय की आत्मा को श्रद्धांजलि दी।

उनकी इस वीरता के कारनामे ने काफी लोकप्रियता बटोरी।

लाहौर शहर में जगह–जगह परचे चिपकाए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया।

क्रांतिकारियों के इस क़दम को पूरे भारत में सराहा गया।   

8 अप्रैल, 1929 – सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में शहीद भगत सिंह और शहीद बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली (सेंट्रल असेंबली) दिल्ली में बम विस्फोट को अंजाम दिया।

यह विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए काले कानून के विरोध में था।

विस्फोट का उद्देश्य किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाना था।

बल्कि, अंधी-गूंगी-बहरी ब्रिटिश सरकार के जुल्मों के खिलाफ़ एक छोटी-सी आवाज़ थी।

मार्ग अहिंसा का था, पर प्रभावी था। देशवासी इस कार्य की प्रशंसा कर रहे थे।  

क्रांति बनी ज्वाला

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के बाद शहीद भगत सिंह और शहीद बटुकेश्वर दत्त स्वयं गिरफ्तार हो गए।

दरअसल, वे न्यायालय के जरिए आज़ादी के प्रचार-प्रसार को बढ़ाना चाहते थे।

ज़्यादा से ज़्यादा भारतीयों को इस नए दल में जोड़ना चाहते थे।

कुछ दिनों बाद शहीद सुखदेव और शहीद राजगुरू भी गिरफ्तार कर लिए गए।

ब्रिटिश न्यायालय द्वारा बिना किसी बहस के शहीद भगत सिंह जी, शहीद सुखदेव जी और शहीद राजगुरु जी को फांसी की सजा सुनाई गई।

क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त जी को उम्रकैद की सजा दी गई।

लेकिन, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद अब भी आज़ाद थे।

अंग्रेज पुलिस के हाथ नहीं लगे थे।

कुछ दिनों तक उन्होंने झांसी को आज़ादी का केंद्र बनाया।

वहीं से ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ को आगे बढ़ाने लगे।

एक तरफ पुलिस इन्हें खोज रही थी, दूसरी तरफ ‘आज़ादनए क्रांतिकारियों को जोड़ रहे थे।

बड़े-बड़े वीर क्रांतिकारी शहीद हो चुके थे या जेल में कैद थे। संगठन फिर बिखर चुका था।

पुलिस से बचने के लिए आज़ाद कुछ दिनों तक झांसी में पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी बनकर रहें।

वह स्थान झांसी के सतर नदी के करीब था।

फुर्सत के वक़्त अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद गांव के बच्चों को पढ़ाते और अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाते।

उस गांव का नाम ‘धिमारपुर’ था, जो अब ‘आज़ादपुर’ के नाम से जाना जाता है।

झांसी में क्रांतिकारी सदाशिवराव मलकापुरकर, विश्वनाथ वैशम्पायन और भगवान दास माहौर उनके काफी करीबी और क्रांतिकारी दल का हिस्सा थे।

आशा बनी निराशा

शहीद भगत सिंह जी, शहीद सुखदेव जी और शहीद राजगुरु जी की फांसी की ख़बर सुनकर आज़ाद की नींद उड़ चुकी थी।

वे तीनों क्रांतिकारियों की फांसी की सजा कम करवाने के प्रयास में जुटे थे।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों की प्रमुख सहयोगी दुर्गा भाभी जी को गांधी जी के पास भेजा, लेकिन निराशा हाथ लगी।

20 फरवरी, 1931 – इलाहाबाद

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, भारतीय पत्रकार, राष्ट्रीय सम्मेलन के नेता और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता गणेश शंकर विद्यार्थी से हरदोई जेल में मिलकर और परामर्श लेकर, इलाहाबाद गए थे।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी से मिलने, उनके निवास स्थान आनंद भवन।

आज़ाद जी ने नेहरू जी से आग्रह किया कि कृपया गांधी जी से कहकर, लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फांसी को उम्रकैद में बदलवाएं।

लेकिन, यहां भी निराशा हाथ लगी।

27 फरवरी, 1931 – इलाहाबाद

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद के प्रसिद्ध अल्फ्रेड पार्क में अपने मित्र सुखदेव राज के साथ बातचीत कर रहे थे।

वे शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद राजगुरु की फांसी को हर हाल में रुकवाना चाहते थे।

उसी दौरान वीरभद्र तिवारी नामक एक मुखबिर ने इलाहाबाद पुलिस को इस बात की सूचना दे दी।

कुछ पल बाद अंग्रेज पुलिस ने आज़ाद जी को चारों ओर से घेर लिया।

फिर शुरू हुई दोनों ओर से भयंकर गोलीबारी।

आज़ाद जी बहादुरी से अकेले सिपाहियों से लोहा लेते रहें।

गोलियों का शोर पूरे अल्फ्रेड पार्क में गूंज उठा।

तीन पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतारने के बाद आज़ाद जी की बंदूक में सिर्फ़ एक गोली बची थी।

पुलिस ने उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए कहा।

लेकिन, आज़ादी के मतवाले मरने से कब डरते थे!

एक तरफ गुलामी भरी ज़िंदगी और दूसरी ओर खूबसूरत मौत थी।

देश के लिए मर-मिटने का गर्व था।

आज़ाद जी ने हमेशा की तरह उस दिन भी आज़ादी को चुना।

उनका कहना था कि “जीते जी आज़ाद, कभी पुलिस के हाथ नहीं आएगा।”

और वही हुआ।

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद ने बंदूक की आख़िरी गोली ख़ुद पर चलाकर सदा के लिए ‘अमर शहीद आज़ाद’ हो गए।

जब आज़ाद हुए अमर शहीद

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: 27 फरवरी, 1931 की सुनहरी तारीख को वीरता का एक नया अध्याय इतिहास के पन्नों पर युगों के लिए जुड़ गया।

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का अंतिम संस्कार जब अंग्रेज सरकार ने चुपके से कर दिया, तो पूरे प्रयागराज की भीड़ सड़कों पर उतर आई।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ नारेबाजी की गूंज पूरे इलाहाबाद में सुनाई देने लगी।

पूरे शहर में तनाव फैल गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे।

अल्फ्रेड पार्क में जिस पेड़ के नीचे चंद्रशेखर आज़ाद जी शहीद हुए थे, जनता उसे पूजने लगी।

पेड़ पर झंडियां बांध दी गईं। लोग उस मिट्टी को माथे लगाने लगे।

कपड़ों में बांधकर पवित्र मिट्टी को अपने घर ले जाने लगे।

पेड़ के नीचे दीपक आदि जलाने लगे।

जुलूस में उमड़ा हिंदुस्तान

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: अगले दिन अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी की अस्थियां चुनकर युवकों द्वारा जुलूस निकाला गया।

कहा जाता है कि उस जुलूस में उम्मीद से परे भीड़ थी।

देखकर लग रहा था कि जैसे प्रयागराज के रूप में सारा हिंदुस्तान, देश के बहादुर सपूत को अंतिम विदाई देने उमड़ पड़ा हो।

इस तरह प्रयागराज की जनता ने देश के वीर सपूत, महान क्रांतिकारी, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी को अंतिम विदाई दी।  

सम्मान में समर्पित अल्फ्रेड पार्क  

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: प्रयागराज के जिस ‘अल्फ्रेड पार्क’ में चंद्रशेखर आज़ाद जी शहीद हुए थे, अब वह पार्क ‘चंद्रशेखर आज़ाद पार्क’ के नाम से जाना जाता है।

यह पार्क उनके सम्मान में समर्पित है।

आज भी वहां उनसे जुड़ी कई यादें संजोकर रखी गई हैं।

पार्क में अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी की एक मनमोहक प्रतिमा स्थापित है।

उन्होंने जिस पिस्तौल से ख़ुद को गोली मारी थी, उसे भी ‘इलाहाबाद म्यूजियम’ में संजोकर रखा गया है।

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद यानी वीरता की मिसाल।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आग।

उनके बलिदान के बाद देश में आंदोलन की स्पीड और तेज हो गई।

उनसे प्रेरित होकर देश के हज़ारों युवा स्वतंत्रता आंदोलन की ज्वाला में कूद पड़े।

भारत माता की स्वाधीनता के लिए ख़ुद को कुर्बान कर दिया।  

शहादत के 16-17 साल बाद मिली आज़ादी

Chandrashekhar Azad Ki Kahani: अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के 16-17 साल के बाद यानी 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र भारत का जन्म हुआ।

एक 14-15 साल का बालक भारत के स्वतंत्रता संगम आंदोलन में कूद पड़ा मर-मिटने के लिए।

और, 24 साल की उम्र में सदा के लिए इतिहास रच गया।

इससे बड़ा गर्व एक माता-पिता और देश के लिए क्या हो सकता है?

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी की तरह लाखों-करोड़ों बलिदानों की बदौलत, देश हर साल अपना ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाता है।

इस अवसर पर देश के सभी अमर शहीदों को कोटि-कोटि नमन!

हर भारतीय को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

प्रयागराज की 133 एकड़ भूमि पर फैला ‘चंद्रशेखर आज़ाद पार्क’ भव्य और आकर्षण का केंद्र है।

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