Devbhoomi Dwarka Gujarat: स्वर्ग और मोक्ष का द्वार

इस लेख में हम द्वारका धाम का महत्व, श्री द्वारकाधीश मंदिर कहां स्थित है? कब हुआ द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण? क्यों प्रसिद्ध है द्वारकाधीश? कैसे जाएं द्वारका गुजरात? ऐसी ही कई दिलचस्प जानी-अनजानी देवभूमि द्वारका, गुजरात (Devbhoomi Dwarka Gujarat) की बातें जानेंगे।

उस दिन न बारिश हो रही थी और न ही मौसम सुहावना था। मई का महीना था बदन पिघला देने वाली धूप थी। माथे से पसीना टप-टप टपक रहा था। भीषण गर्मी के कहर के बावजूद, मन बेहद शांत और खुश था। होता भी क्यों नहीं? भगवान श्री कृष्ण की द्वारका नगरी (Devbhoomi Dwarka) में होने का अहसास जो था। श्री द्वारकाधीश की ऐसी अनगिनत महिमा देवभूमि द्वारका, गुजरात (Devbhoomi Dwarka Gujarat) को स्वर्ग और मोक्ष का द्वार बनाती है।

आशीष मिश्र

द्वारका धाम का महत्व

द्वारकाधीश श्री कृष्ण की नगरी की यात्रा पर चलने से पहले, चलिए द्वारका धाम का महत्व समझ लेते हैं। Gujarat स्थित Devbhoomi Dwarka किसी परिचय का मोहताज नहीं। इस शहर की महिमा सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं है। देश के अलावा विदेशों में भी भगवान श्री कृष्ण के अनंत भक्त हैं। जिन पर मोहन की कृपा बरसती है, वो सात समुद्र पार करके इनके दर्शन करने आ जाते हैं।

द्वारका धाम का महत्व: युगों-युगों से भक्त यह मानते आए हैं कि द्वारका मोक्ष और स्वर्ग का द्वार है। चार पवित्र धामों में से एक और सात पवित्र पुरियों में से एक पुरी है। द्वारका धाम में भगवान श्री कृष्ण कण-कण में विराजमान हैं। पानी की हर बूंद में मौजूद हैं। भक्तों की हर सांस में बसते हैं श्री राधे-कृष्ण। श्रद्धा और विश्वास की अटूट डोर है देवभूमि द्वारका Devbhoomi Dwarka, जहां हर मौसम भक्तों का ताता लगा रहता है। Dwarka Gujarat के माथे की सदा चमकने वाली शानदार बिंदी है। भक्ति, आस्था और उत्साह का केंद्र है। द्वारका धाम राज्य की बढ़ती अर्थव्यवस्था का साथी और कई ज़िंदगी की रोजीरोटी का माध्यम है। द्वारका धाम का महत्व अनंत है।

श्री द्वारकाधीश मंदिर कहां है?

द्वारका धाम का महत्व समझने के बाद चलिए, अब यह जान लेते हैं कि श्री द्वारकाधीश मंदिर कहां स्थित है? देवभूमि द्वारका (Devbhoomi Dwarka) गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा एक प्राचीन नगर है। नदी और समुद्र का अद्भुत मिलन, इस शहर की सुंदरता में चार-चांद लगाता है।

द्वारका धाम का महत्व: ब्रज, उत्तर प्रदेश छोड़ने के बाद इस पवित्र नगर की स्थापना भगवान श्री कृष्ण ने की थी। जो भारत के गुजरात (Gujarat) राज्य के देवभूमि द्वारका (Devbhoomi Dwarka) जिले में स्थित है। हिन्दुओं की आस्था की धड़कन, सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। हिंदू धर्म का गौरव और मानवता का प्रतीक है। सदियों की प्रेरणा, युगों का विश्वास है।

द्वारका धाम का महत्व: ऐसी ही और कई विशेषताएं देवभूमि द्वारका (Devbhoomi Dwarka) को श्री द्वारिकाधीश की द्वारकापुरी बनाती हैं। श्री द्वारकाधीश मंदिर द्वारका (Dwarka) में गोमती नदी और अरब सागर के मुहाने पर स्थित है।

द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण

द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण: श्री द्वारकाधीश मंदिर द्वारका (Dwarka) की शान है। जिसकी एक झलक पाने के लिए भक्त बड़ी दूर-दूर से पहुंचते हैं। श्री द्वारकाधीश मंदिर को जगत मंदिर भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्री द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण 2,500 साल पहले हुआ था। और इसका श्रेय भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र श्री वज्रनाभ को जाता है। वे द्वारका के अंतिम शासक थे।

द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण: इतिहास के पन्ने पलटकर देखने पर यह पता चलता है कि श्री द्वारकाधीश मंदिर के साथ कई बार छेड़छाड़ किया गया था। अनेकों बार बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा हमला किया गया था। भारत और सनातन धर्म के गौरव पर प्रहार किया गया था। 1472 में मंदिर की वास्तविक संरचना को महमूद बेगड़ा द्वारा नष्ट कर दिया गया था। महमूद बेगड़ा इतिहास का सबसे जालिम शासक था।

द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण: 15वीं-16वीं शताब्दी में एक बार फिर मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। मौजूदा श्री द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण चूना पत्थर से किया गया है, जिसकी बनावट और सजावट बेजोड़ है। मंदिर परिसर के भीतर छोटे-बड़े और कई मंदिर बने हैं। सबमें अलग-अलग देवी/देवता स्थापित हैं।

क्यों प्रसिद्ध है द्वारकाधीश?

द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण: चलिए जान लेते हैं कि श्री द्वारकाधीश मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? श्री द्वारकाधीश मंदिर के मुख्य गर्भगृह में विराजमान भगवान श्री कृष्ण के अद्भुत दर्शन से जहां भक्तों के मन को गजब की शांति मिलती है, वहीं श्री द्वारकाधीश मंदिर की लाजवाब कारीगरी देख निगाहें थम जाती हैं। मंदिर की हर दीवार पर पौराणिक पात्रों और दंतकथाओं को बड़ी बारीकी से उकेरा गया है। मंदिर की हर बनावट में प्राचीन हुनर और गौरवशाली इतिहास की झलक देखने को मिलती है।

श्री द्वारकाधीश मंदिर के गर्भगृह में चांदी के सिंहासन पर भगवान श्री कृष्ण विराजमान हैं। उनकी श्यामवर्णी चतुर्भुजी प्रतिमा खूबसूरती की मिसाल है। आकर्षण का केंद्र है। अपने प्रभु को निहारते ही भक्त निहाल हो उठते हैं। नई उमंग और ऊर्जा से भर जाते हैं। थकावट पल में मिट जाती है। आंखों में आंसू भी आ जाते हैं। श्री द्वारकाधीश के जयकारे से पूरा वातावरण गूंज उठता है। भगवान श्री द्वारकाधीश हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए सदियों से द्वारका (Dwarka) आने वाले तीर्थयात्रियों, श्रद्धालुओं और भक्तों के मन की मुराद पूरी कर रहे हैं।

श्री द्वारकाधीश मंदिर का मुख्य आकर्षण

5 मंजिला वाला यह पौराणिक मंदिर, 72 खंभों पर मजबूती से खड़ा है। 43 मीटर ऊंचे शिखर पर 52 गज कपड़े से बनी धर्मध्वजा, जब अरब सागर से आने वाली हल्की-सी हवा के साथ लहराती है, तो उसकी शान देखते ही बनती है। स्थानीय लोगों की मानें तो धर्म-ध्वजा को दिन में चार बार बदला जाता है। और इसका सारा ख़र्च श्री कृष्ण भक्त उठाते हैं। जिनकी मुरादें द्वारकाधीश पूरी करते हैं, वे अपनी भक्ति में धर्म-ध्वजा समर्पित करते हैं। ऐसे श्रद्धालुओं की संख्या बहुत है।

धर्म-ध्वजा में छपी सूर्य और चंद्रमा की तस्वीरें यह दर्शाती हैं कि ‘जब तक पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा रहेंगे, तब तक श्री कृष्ण रहेंगे’। मंदिर में दो द्वार हैं। एक प्रवेश के लिए, दूसरा निकास के लिए। इन दोनों दरवाजों को ‘स्वर्ग और मोक्ष’ का द्वार कहा जाता है।

मंदिर परिसर के भीतर, श्री द्वारकाधीश मंदिर के निकट, श्री आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदा पीठ धाम भी स्थित है। यह उनके दौरे के सम्मान में स्थापित है। श्री आदि शंकराचार्य जी महाराज 8वीं सदी के महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। जगतगुरू शंकराचार्य ने ही चारधाम यात्रा का प्रचार किया था। लोगों को इन धामों का महत्त्व बताया था। जैसा कि आप जानते ही हैं कि हमारे चारोंधाम चार-दिशाओं में मौजूद हैं। जो देश को अखंडता, और समृद्धि की डोर से जोड़े हुए हैं।    

द्वारका गुजरात की स्थापना

गूगल रिसर्च यह बताता है कि कंस के ससुर मगधपति जरासंध से यादव कुल की सुरक्षा के लिए द्वारकापुरी आ बसे थे। अपने सभी यादव परिवार के साथ। उसके बाद द्वारका नगरी ही उनकी कर्मभूमि रही। लगभग 36 वर्षों तक भगवान श्री कृष्ण द्वारका (Dwarka) के द्वारकाधीश रहें। कहते हैं कि जब श्री द्वारकेश ने वैकुंठ प्रस्थान किया, तो उनके द्वारा बसाई द्वारका नगरी भी समुद्र में स्वतः ही डूब गई। लेकिन, ईश्वर का चमत्कार देखिए, श्री कृष्ण के मूल मंदिर (ओरिजिनल टेंपल) को कोई हानि नहीं पहुंचा। जैसा था, वैसा ही अडग रहा। युगों-युगों तक भक्तों का उद्धार करने के लिए।

कहते हैं कि श्री कृष्ण की द्वारका नगरी बहुत भव्य, समृद्ध, खुशहाल और खूबसूरत थी। लोगों में मानवता, भक्ति और एकता थी। आलीशान द्वारका नगरी का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था। एक रात में भगवान की सेवा में समर्पित किया था। जानकारों की मानें तो देवभूमि द्वारका (Devbhoomi Dwarka) की चर्चा पवित्र महाकाव्य ‘महाभारत’ में मिलती है। यह श्री कृष्ण का साम्राज्य था और वे इसके राजा थे।

समय-समय पर हुए शोध भी यह साबित करते हैं कि देवभूमि द्वारका (Devbhoomi Dwarka) एक ऐतिहासिक और पौराणिक नगर है और प्रभु ‘श्री कृष्ण की राजधानी’ थी। प्राचीन द्वारका नगरी की दीवारें आज भी समुद्र के सतह में मौजूद हैं! द्वारका (Dwarka) छह बार समुद्र में डूबी थी। मौजूदा द्वारका सातवां अवतार है।

सुदामा सेतु – कृष्ण-सुदामा की दोस्ती की निशानी  

सेतु यानी पुल या ब्रिज। गोमती नदी पर बना ‘सुदामा सेतु’ श्री द्वारकाधीश मंदिर को पंचनद तीर्थ अर्थात पंच कुई से जोड़ता है। शाम के समय यह पुल, जब एलईडी रोशनी से जगमगाता है, तो आकर्षण देखते ही बनता है। ‘सुदामा सेतु’ कन्हैया के सबसे प्रिय सखा श्री संत सुदामा की याद में समर्पित है। या यूं कहें कि वासुदेव और सुदामा की मित्रता की निशानी है।

यह सस्पेंशन पैदल यात्री पुल तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को खूबसूरत द्वारका बीच तक पहुंचने में मदद करता है। नदी के उस पार से आप श्री श्याम की नगरी द्वारका का अलग नज़रिए से दीदार कर सकते हैं। एक ओर भव्य मंदिर और प्राचीन शहर का अद्भुत नज़ारा, और दूसरी तरफ ठंडी हवा के साथ बहकर आते समुद्र के नीले पानी, तन और मन, दोनों जीत लेते हैं।

पुल के उस पार से श्री द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन की बात ही निराली है। घरों की भीड़भाड़ में भी दूर गगन तक सर उठाए अपनी शान को दर्शाता है। नदी उस पार से आप गोमती घाट की अनदेखी और अनसुनी सुंदरता का लुफ्त उठा सकते हैं। साथ ही, समुद्र तट पर ऊंट, बाइक सवारी, इत्यादि का आनंद उठा सकते हैं।

ज़्यादातर श्रद्धालु श्री लक्ष्मी नारायण प्राचीन मंदिर और पांच पांडव कुएं के दर्शन करने के उद्देश्य से नदी उस पार जाते हैं। जिस स्थान पर गोमती नदी का समुद्र से मिलन होता है, वहां से सूर्यास्त का अद्भुत नज़ारा अपने कैमरे में कैद किया जा सकता है। समुद्र तट पर बैठकर, अकेले या अपने साथी के साथ, समुद्र की सुरीली लहरों, सुहानी हवाओं और मनमोहक पक्षियों के अनूठे रूप का अनुभव कर सकते हैं। पुल बंद होने के कंडीशन पर नदी के उस पार बोट से भी पहुंचा जा सकता है।   

देवभूमि द्वारका (Devbhoomi Dwarka) नगरी, श्री कृष्ण के साथ-साथ श्री सुदामा की सुनहरी यादों से भरी हुई है। आज भी उनकी दोस्ती की कई मिसालें जिंदा हैं। कई सबूत मौजूद हैं। यहां सुदामा सेतु, गोमती नदी और समुद्र का अतुल्य संगम है। हवाओं में श्री कृष्ण की गूंज है। द्वारका भारत के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। द्वारका, बद्रीनाथ, पुरी और रामेश्वरम, भारत के चारधाम हैं। आस्था, मुक्ति और विश्वास के केंद्र हैं।

फैमिली के लिए परफेक्ट प्लेस  

चलिए, अब द्वारका को पर्यटन के नज़रिए से देखते हैं। द्वारका शहर छोटा, मगर सुकून से भरा है। जहां आप अपने परिवार के साथ शांति के पल बिता सकते हैं। किनारों पर बैठकर, समुद्र को अलग अंदाज़ में देख सकते हैं। AC से ज़्यादा ठंडी और शुद्ध हवाओं का अहसास ले सकते हैं। कभी इस कोने से उस कोने, कभी इस पार से उस पार तक, समुद्र के तीरे-तीरे घंटों पैदल चल, फुर्सत के पल बिता सकते हैं। नदी के किनारे-किनारे यानी समुद्र और नदी के मिलन स्थल तक सुकून के पल बिताने के लिए बैठने की बेहतर व्यवस्था के साथ चलने के लिए पक्का रास्ता बनाया गया है।

यहां के समुद्र का पानी पूरी तरह से क्लीन है। पुलिस की निगरानी और सुरक्षा के दायरे में कुछ भक्त आस्था की और कुछ पर्यटन रोमांच की डुबकी लगाते हैं। लोग घंटों स्वच्छ पानी में लिपटे रहते हैं। बच्चे और जवान की बात छोड़िए साहब, बूढ़े भी रोमांचित हो उठते हैं। कुछ श्रद्धालु गोमती माता और समुद्रदेव को घी आदि का दीपक अर्पित करते हैं। ख़ुद और परिजनों की खुशहाली के दिए जलाते हैं।

अगर आप लोकल हुनर पर यकीन करते हैं, तो समुद्र के किनारे बैठकर, आप सस्ते दाम में टैटू भी करा सकते हैं। स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए बेहतरीन हस्तशिल्प, कपड़े आदि की शॉपिंग कर सकते हैं।

रोमांच का गढ़ द्वारका

जो लोग यह सोचते हैं कि द्वारका सिर्फ़ बुजुर्गों के मोक्ष का द्वार है। तब वे इस शहर के बारे में कम जानते हैं। आधुनिक द्वारका में भक्तिमय माहौल के साथ-साथ आपको कई रोमांचक आउटडोर एक्टिविटी का आनंद भी मिल जाएगा। तीर्थयात्री यहां बोट सवारी, ऊंट सवारी, पैराशूट सवारी (पैराग्लाइडिंग), जेट स्की (वाटर स्कूटर) जैसी कई गतिविधियों का मज़ा उठा सकते हैं। भगवान श्री द्वारकाधीश के दर्शन करने के बाद लोग अपने परिवार के साथ रोमांच की दुनिया में खो जाते हैं।

अनुभव दूसरों का

द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण के दर्शन को आए एक भक्त से हुई बातचीत के दौरान उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि “श्री द्वारकाधीश के दर्शन से जीवन धन्य हो गया। बड़े सौभाग्यशाली होते हैं वो लोग, जिन्हें प्रभु दर्शन देते हैं। अपनी चौखट पर बुलाते हैं। मैं परम भाग्यशाली हूं! वैसे तो द्वारका का अनुभव मेरे लिए बढ़िया रहा, पर मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्था से मन थोड़ा खिन्न है। भीड़ को संभालने के लिए उचित व्यवस्था नहीं है। दो-दो, तीन-तीन दिन यात्रा करके आने पर, अगर दर्शन ठीक से नहीं हो पाता, तो आनंद नहीं आता। मंदिर ट्रस्ट से मेरा बस इतना ही कहना है कि दर्शन और भीड़ की उचित व्यवस्था करे। श्री सोमनाथ मंदिर की तरह। बाकी सब ठीक है।”

पंडित अरविंद त्रिपाठी , मुंबई

अपने दौरे के दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे भाई से हुई, जो मंदिर परिसर के भीतर श्री कृष्ण भक्तों ख़ासकर बच्चों को चॉकलेट बांट रहे थे। अपनी तरफ से भगवान की भक्ति के साथ लोगों की सेवा कर रहे हैं। 30-35 वर्षीय उस युवक ने बताया कि वह हर दिन हज़ारों रुपए की चॉकलेट बांटता है।

मोबाइल फोन और हैंडबैग मना

सुरक्षा की दृष्टि से मंदिर परिसर के भीतर मोबाइल फोन, हैंडबैग, इत्यादि ले जाने पर सख्त पाबंदी है। दर्शनार्थियों को दो जांच के बाद मंदिर के मुख्य गर्भगृह में छोड़ा जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर परिसर के बाहर लॉकर की व्यवस्था की गई है। जहां आप अपने कीमती सामान को सुरक्षित रख सकते हैं। अगर होटल नजदीक है, तो प्रतिबंधित वस्तुओं को कमरे में रखकर जाने में समझदारी है।

द्वारका का खानपान

खानपान की बात करें तो यहां के रेस्टोरेंट में स्थानीय व्यंजन (गुजराती थाली) के अलावा; साउथ इंडियन, पंजाबी, जैन, राजस्थानी, इत्यादि सहित कई भारतीय और विदेशी व्यंजन आसानी से मिल जाते हैं। मंदिर ट्रस्ट की ओर से भंडारे की व्यवस्था मंदिर परिसर के बाहर की गई है। जहां तीस रुपये में भर-पेट प्रसाद (भोजन) मिलता है। स्वच्छ और स्वादिष्ट। यहां बनने वाले भोजन में आपको गुजराती टेस्ट मिल सकता है।   

देवभूमि द्वारका में होटल
देवभूमि द्वारका, गुजरात (Devbhoomi Dwarka, Gujarat) में ठहरने के लिए आपको कई बेहतरीन होटल और होम स्टे सस्ते दाम में मिल जाते हैं। बस ध्यान रहे, सीजन के दौरान ऑनलाइन बुकिंग के साथ घर से निकलना बेहतर होगा। होटल बुकिंग के लिए आप मंदिर संस्था से ऑनलाइन संपर्क कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए गुजरात पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं। इसके अलावा, आप MMT, OYO आदि के जरिए भी होटल एडवांस में बुक कर सकते हैं। द्वारका में कई होटल नदी और समुद्र के किनारे बसे हैं। यहां ठहरने पर आपको ठंडी हवाओं के साथ समुंद्र का अनूठा नज़ारा हर समय मिलता रहेगा।

कैसे जाएं द्वारका गुजरात?

कैसे जाएं द्वारका, गुजरात? देवभूमि द्वारका, गुजरात (Devbhoomi Dwarka, Gujarat) पहुंचना बहुत ही आसान है। यह मजबूत रोड नेटवर्क, रेल नेटवर्क और एयरपोर्ट से वेल-कनेक्टेड है। आप भारत के किसी भी राज्य से पहुंच सकते हैं। द्वारका रेलवे स्टेशन से श्री द्वारकाधीश मंदिर की दूरी लगभग एक किलोमीटर है। नजदीकी एयरपोर्ट पोरबंदर (95 किमी) और जामनगर (145 किमी) है। वडोदरा और अहमदाबाद से सरकारी और प्राइवेट स्लीपर बसों द्वारा भी पहुंचा जा सकता है।

कैसे जाएं द्वारका, गुजरात: अगर आप मुंबई में रहते हैं, तो मुंबई सेंटल (MMCT) से द्वारका (DWK) के लिए हर दिन 21:05 बजे सौराष्ट्र मेल (22945) छूटती है। लगभग 17 घंटे के सफर के बाद आप श्री द्वारकाधीश की नगरी देवभूमि द्वारका, गुजरात (Devbhoomi Dwarka, Gujarat) बड़े आराम से पहुंच सकते हैं।

कैसे जाएं द्वारका गुजरात: अगर आप भारत के अन्य किसी राज्य में रहते हैं, तो वडोदरा या अहमदाबाद पहुंच जाइए। इन दोनों रेलवे स्टेशनों से द्वारका के लिए डायरेक्ट ट्रेन छूटती है। मौजूदा समय में इन दोनों रेलवे स्टेशन से मात्र तीन ट्रेनें छूटती हैं।

Devbhoomi Dwarka, Gujarat:

ध्यान देने वाली अन्य बातें

दर्शन का समय: सुबह 6:30 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक । शाम 5:00 बजे से रात 9:30 बजे तक

आरती का समय: सुबह 6:30 बजे और 10:30 बजे । शाम 7:30 बजे और रात 8:30 बजे

  • श्री द्वारकाधीश को ग्यारह बार भोग चढ़ता है
  • गोमती नदी और समुद्र के संगम घाट पर श्री नारायण मंदिर है  
  • समुद्र के घर में पांच पांडव कुंड के मीठे जल का स्वाद है    
  • समुद्र तट पर दूर तक फैले सफेद रेत का दीदार है  
  • समुद्र की ऊंची लहरों के बीच ऊंट आदि की रोमांचक सवारियां हैं  
  • शाम के वक़्त बेहद शांत और खूबसूरत वातावरण का आनंद है
  • हाथों की नज़ाकत से बने बैग, जैकेट, साड़ी, स्कार्फ, आदि की चमक है

बेट द्वारका का महत्व
द्वारकाधीश श्री कृष्ण की लीला-यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती है! अभी बेट द्वारका, गोपी तालाब और श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का सफर बाकी है। इन दोनों पवित्र स्थलों की जानकारी पढ़िए अगले लेख में। gyanmanch पर कीजिए, भक्ति, विश्वास और रोमांच भरी बेट द्वारका की अनसुनी सैर! एक ऐसी जगह, जो समुद्र की गोद में बसी है। यह वह पवित्र स्थान है, जहां भगवान श्री कृष्ण की ‘भेंट’ मित्र श्री सुदामा से हुई थी। द्वारका धाम में श्री रुक्मणी देवी मंदिर भी स्थित है।

सिर्फ़ gyanmanch पर मिलेगा ज्ञान और मनोरंजन से भरपूर जानकारी।

जय श्री कृष्णा! जय श्री द्वारकाधीश!