Grishneshwar Temple History in Hindi: महादेव की महागाथा!

Grishneshwar Temple History, Jyotirlinga Story, Timings, Near Hotels & Aurangabad to Distance in Hindi: देवों के देव महादेव के 12वें ज्योतिर्लिंग की कहानी बेहद दिलचस्प है। शिव भक्तों का मानना है कि श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से मन की सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं। यह संसार का एकमात्र पूर्वाभिमुख शिवलिंग है आइए, जानते हैं महादेव की महागाथा!

Grishneshwar Temple History, Jyotirlinga Story, Timings, Near Hotels & Aurangabad to Distance in Hindi:

श्री घृष्णेश्वर 12वां ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के श्रीक्षेत्र एलोरा में स्थित है।

भगवान शिव का यह दिव्य मंदिर औरंगाबाद रेलवे स्टेशन से लगभग 30 किमी की दूरी पर विराजमान है।

यह प्राचीन मंदिर देवगिरी किले के पास और एलोरा गुफाओं के नजदीक मौजूद है।

श्री घृष्णेश्वर मंदिर देवस्थान ट्रस्ट, श्रीक्षेत्र एलोरा द्वारा प्रकाशित बुक के अनुसार, श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख श्री शिवपुराण और श्री पद्मपुराण जैसे कई प्राचीन एवं पवित्र ग्रंथों में मिलता है।

मान्यता है कि पहले श्रीक्षेत्र एलोरा के आसपास नाग जाति के आदिवासी लोग रहा करते थे।

इन्हें ‘नागा आदिवासी’ और ‘नागवंशी’ के नाम से भी जाना जाता था।

‘नागा आदिवासी’ जिस स्थान पर रहते हैं या थे, उसे ‘बांबी (सर्प का बिल)’ कहा जाता है।

मराठी में इसे ‘वारूळ’ कहा जाता है। आगे चलकर यह स्थान ‘वारूळ’ और ‘वेरुळ’ हो गया।

दूसरी कथा के अनुसार, इस क्षेत्र में कई वर्षों तक ‘एल’ नामक राजा राज किया करता था।

मौजूदा समय में यह स्थान उसी राजा के नाम से जाना जाता है। जिसे हम ‘एलापुर’ या ‘एलोरा’ कहते हैं।

श्री घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास (Grishneshwar Temple History in Hindi)

भगवान श्री घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास बेहद रोमांचित और प्रेरित करने वाला है।

बेजोड़ नक्काशी वाले इस मंदिर का निर्माण 17वीं सदी में किया गया था।

भव्य मंदिर बनवाने का श्रेय इंदौर की देवी महारानी अहिल्याबाई होलकर जी को जाता है।

मंदिर का निर्माण सन 1791 में कराया गया था।

मंदिर के हर छोर पर लाल पत्थर, दमदार इंटरलॉकिंग सिस्टम और हुनरमंदी की बेमिसाल कारीगरी दिखती है।

आपको बता दें कि उन लाल पत्थरों को एलोरा गुफा के पास मौजूद लाल खदान से काटकर लाया गया था।

पत्थरों को काटकर और सुंदर कलाकृति बनाकर इंटरलॉकिंग सिस्टम के जरिए जोड़ा गया है।

मंदिर का आधा भाग चुना, रेती, बेलफल, गोंद और काली दाल सहित 17 प्रकार की जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बना है।

उस हिस्से पर भगवान श्रीहरि के दशावतार दिखाए गए हैं।

साथ ही, भगवान ब्रह्मा जी, प्रभु श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी सहित अन्य कई देवी-देवताओं की अद्भुत प्रतिमाएं विराजमान हैं।

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मंदिर का आकार और बनावट

श्री घृष्णेश्वर मंदिर का बाहरी हिस्सा 80×61 मीटर है, जिसमें चार छोटे-छोटे दरवाजे हैं।

प्रमुख द्वार दक्षिण दिशा की ओर है।

पास ही एक विशाल नगाड़ा रखा गया है, जिसे प्रतिदिन आरती के समय बजाय जाता है।

मौजूदा समय में भक्तों की अपार भीड़ को मद्देनजर रखते हुए पश्चिमी दरवाजे का आकार बढ़ाया गया है।

श्रीक्षेत्र एलोरा में स्थित श्री घृष्णेश्वर मंदिर की प्रत्यक्ष लंबाई और चौड़ाई 28×20 मीटर है।

यह प्राचीन मंदिर सदियों से 24 मजबूत और बेहतरीन नक्काशी वाले खंभों पर खड़ा है।

हर खंभे पर सुंदर चित्रकारी और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लाजवाब शिल्पकला के रूप में दर्शाई गई हैं।

मुख्य मंदिर में तीन प्रवेश द्वार और मुख्य गर्भगृह में एक प्रमुख प्रवेश द्वार है।

प्रवेश द्वार के ऊपर दशावतार के साथ रुद्राक्ष की माला बड़े सुंदर रूप में दर्शाई गई है।

मंदिर का गर्भगृह एक मीटर नीचे है। उतरने के लिए तीन सीढ़ियां मौजूद हैं।

सीढ़ियां उतरते ही भगवान शिव के 12वें ज्योतिर्लिंग के भव्य दर्शन होते हैं।

गर्भगृह की कुल लंबाई और चौड़ाई 6×6 मीटर है।

मंदिर के सभा मंडप में प्रवेश करते समय प्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश की बैठी मूर्ति और उनके ऊपर माता सरस्वती की प्रतिमा दिखाई देती है।

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा (Grishneshwar Jyotirlinga Story in Hindi)

भगवान घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा, आस्था और विश्वास की अनोखी मिसाल है।

कहानी युगों पुरानी है।

कहते हैं कि देवों के देव महादेव की इस नगरी में एक प्रचंड विद्वान ब्राह्मण रहा करता था।

पंडित जी का नाम सुधर्मा और पंडिताइन का नाम सुदेहा था।

दुर्भाग्य की बात यह थी कि पति-पत्नी को कोई औलाद नहीं थी।

संतान सुख से वंचित होने की वजह से सुदेहा बेहद कष्ट, प्रताड़ना और व्यंग्य सहन करते हुए जीवन यापन कर रही थीं।

समाज की खुशहाल महिलाएं अपने तानों की तीर से बेचारी सुदेहा को हर दिन घायल करती थीं।

पंडित जी महाज्ञानी थे। इसलिए, बेफिजूल बातों पर ध्यान नहीं देते थे।

बल्कि, अपना बहुमूल्य समय पूजा-पाठ आदि जैसे भले कार्यों में खर्च करके मस्त रहते थे।

रोज-रोज लोगों की कड़वी बातें सुन-सुनकर सुदेहा की सहनशीलता वाली दीवार एक दिन ढह गई।

वह निर्वंश (निःसंतान) नहीं, बल्कि मां कहलाना चाहती थीं।

घर और समाज में अपना सम्मान बढ़ाना चाहती थीं। कीमत की परवाह नहीं थी।

पति की करा दी दूसरी शादी

अपनी हठ से एक दिन पत्नी ने पति के विचारों पर जीत हासिल कर लिया।

दूसरी शादी के लिए अपने पति और अपनी बहन ‘घृष्णा’ को मना लिया।

विवाह के कुछ वर्षों बाद देवी घृष्णा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

पुत्र के जीवन में आने से पंडित सुधर्मा, पंडितताइन सुदेहा और देवी घृष्णा बहुत अधिक खुश थे।

बच्चे की किलकारी के साथ घर ही नहीं, बल्कि उससे संबंधित सभी लोगों के जीवन में नई उमंग और ऊर्जा का संचार हो उठा।

आपको बता दें कि देवी घृष्णा बचपन से ही परम शिव भक्त थीं।

शादी और बच्चे होने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया।

वह प्रतिदिन अपने घर के पास मौजूद शिवालय सरोवर में पार्थिव लिंग बनाकर विसर्जित करती थीं।

उनके इसी अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें दिव्य पुत्र का उपहार दिया था।

मानव बना दानव

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जैसे-जैसे समय की गति बढ़ी, दोनों सगी बहनों के बीच दूरी बनती गई।

पता नहीं क्यों सुदेहा को अचानक यह महसूस होने लगा कि पुत्र होने के बाद से घर और समाज वाले घृष्णा को ज़्यादा चाहने लगे हैं।

अधिक मान-सम्मान देने लगे हैं।

इर्ष्या से विनाश का जन्म होता है और हुआ वही।

अब तक सुदेहा जिस पुत्र को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करती थी।

अब उस आखिरी चिराग को जल्द से जल्द बुझा देना चाहती थी।

प्रतिशोध की इसी आग में सुदेहा कई वर्षों तक जलती रही।

वह हर दिन देवी घृष्णा के पुत्र को जान से मारने की योजना बनाने लगी।

और बदक़िस्मती से एक दिन घृष्णा के लाल का काल आ ही गया।

माता बनी कुमाता

जब बच्चा थोड़ा युवक हुआ तो उसकी शादी करा दी गई।

एक रात जब घर के सारे सदस्य गहरी नींद में लिप्त थे।

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सुदेहा ने मौके का फायदा उठाते हुए बड़ी बेरहमी और चालाकी से सोते वक़्त अपने पुत्र का गला काट दिया।

उसके बाद लाश के टुकड़े-टुकड़े करके उसी सरोवर में फेंक दिया, जहां उसकी बहन घृष्णा हर दिन पार्थिव लिंग बनाकर विसर्जित करती थीं।

सुबह जब घृष्णा की पुत्रवधू​ की आंख खुली तो सारे घर में तहलका मच गया।

पुत्रवधू ने सारा घर खोज डाला, लेकिन उसका पति कहीं दिखाई नहीं दिया।

अचानक उसकी नज़र उस बिस्तर पड़ी, जहां उसका पति सोया था।

उसने देखा कि पूरा बिस्तर खून से सना हुआ है।

यह घातक दृश्य देखकर पुत्रवधू के रोंगटे खड़े हो गए।

दोनों नैनों से मोतियों की धारा बहने लगी।

उसकी दर्द भरी वेदना सुनकर घर वाले सहित पास-पड़ोस वालों की भीड़ उमड़ पड़ी।

सबके मन में बस एक ही सवाल गूंज रहा था कि कौन है वह पापी, जिसने इतना बड़ा अपराध किया है?

कौन है वह राक्षस, इतनी निर्मम हत्या करते समय जिसके हाथ नहीं कांपे?

भक्ति में शक्ति है

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एक तरफ सारा घर और गांव शोक मना रहा था।

वहीं दूसरी तरफ देवी घृष्णा रोज की तरह अपनी पूजा में मग्न थीं।

वह हर दिन की तरह उसी शिव सरोवर में पार्थिव लिंग बनाकर विसर्जित कर रही थीं।

वे इस घटना से बिल्कुल अंजान थीं कि उनके इकलौते पुत्र या संतान की निर्मम हत्या हो चुकी है।

पूजा करते समय शिव सरोवर से निकली एक आवाज़ सुनकर अचानक घृष्णा घबरा-सी गईं।

“यह स्वर तो मेरे पुत्र का है!” पुत्र की वेदना मां एक पल में पहचान गई।

देवी घृष्णा ने सरोवर में झांककर देखा तो दोनों आंखें फटी की फटी रह गईं।

अपने पुत्र के शरीर के टुकड़ों को पानी में तैरते देखकर मां शून्य अवस्था में चली गई।

लेकिन, जिसके नाथ यानी रखवाला स्वयं कालों के काल महाकाल हों, उन्हें भला कौन मार सकता है?

कौन काट सकता है? जला सकता है? कौन मिट्टी में दफना सकता है?

तभी एक अद्भुत चमत्कार से मां की आंखें चमक उठीं।

आंसू निकलने बंद हो गए। सांसों की गति सामान्य हो गई।

तन-मन में खुशियों की लहर दौड़ उठी।

देवी घृष्णा बचपन से ही भगवान भोलेनाथ की परम भक्त थीं।

आज महादेव ने उनके जीवनभर की तपस्या का ऐसा फल दिया था, जिसकी पावन गाथा सदा-सदा के लिए अजर-अमर हो गई।

माता घृष्णा ने देखा कि साक्षात् देवों के महादेव उनके पुत्र को फिर से जिंदा करके सरोवर से बाहर निकल रहे हैं।

ऐसा दिव्य दृश्य देखकर देवी घृष्णा स्वयं के जीवन को धन्य मान रही थीं।

जन कल्याण का मांगा वरदान

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महादेव के सरोवर से बाहर आते ही देवी घृष्णा ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया।

“हे देवी! तुम एक पुयात्मा हो और तुम्हारे अच्छे कर्मों ने तुम्हारे पुत्र को जीवनदान दिया है।

तुम्हारी संतान की यह दशा करने वाली तुम्हारी सगी बहन सुदेहा है।

ऐसे पापियों को इस संसार में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

मैं आज अपने इस त्रिशूल से उस पापिन का सदा के लिए अंत कर दूंगा।”

भगवान शिव का प्रचंड रूप देखकर देवी घृष्णा उनके पैरों पर गिर पड़ी।

अपनी बहन के प्राणों की भीख मांगने लगी।

“हे भगवन! देवों के देव महादेव! आप तो परम दयालु हैं।

करुणा और दया के महासागर हैं।

सुदेहा मेरी तरह एक तुक्ष्य इंसान है। अज्ञानी और नादान है।

उसके जघन्य अपराध के लिए मैं आपसे क्षमा मांगती हूं।

कृपया उसे जीवनदान दें। जीने का एक अवसर प्रदान करें नाथ।

आपकी बहुत कृपा होगी भगवन।”

देवी घृष्णा की बात सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए।

उनका रूद्र रूप सामान्य हो गया।

मन में सोचने लगे कि कैसी औरत है यह?

लोग बदला लेने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।

लेकिन, यह तो देवी निकलीं।

जीवनदान का वरदान

भगवान शंकर जी ने देवी घृष्णा से कहा – “हम तुम्हारी भक्ति और त्याग से अत्यधिक प्रसन्न हैं देवी।

सुदेहा ने जघन्य अपराध किया है। जिसका परिणाम केवल मृत्युदंड है।

परंतु, हम तुम्हारी भावना और प्रार्थना का सम्मान करते हैं।

इसलिए, उसका घृणित अपराध क्षमा करते हैं।

बताओ, तुम्हें और क्या वरदान चाहिए?”

भगवान शिव जी का गुस्सा अब पूरी तरह शांत था और मुखमंडल सहित पूरे शरीर पर गजब का तेज दिखाई दे रहा था।

“जब तक इस ब्रह्मांड में सूरज, चांद और तारे रहेंगे, तब तक आप स्वयं यहां निवास करेंगे।

इस पावन स्थल पर आने वाले सभी भक्तों का कल्याण करते रहेंगे।

जो भक्त अपनी मनोकामना लेकर इस पवित्र जगह पर आएगा।

आप उसकी मुराद अवश्य पूरी करेंगे।

और हां प्रभुवर! आप एक ज्योतिर्लिंग में मेरे नाम से निवास करें। यही मेरी अंतिम इच्छा है।”

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भोलेनाथ का साक्षात् निवास

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“तथास्तु!

आज से इस स्थान पर हम स्वयं निवास करेंगे और लोग हमें ‘घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग‘ के नाम से जानेंगे।”

भगवान शिव जी यह कहकर पल झपकते अदृश्य हो गए।

युगों से ऐसी मान्यता चली आई है कि श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव साक्षात् निवास करते हैं।

मौजूदा समय में काले पत्थरों के खूबसूरत आकार में भगवान महादेव श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं।

मंदिर में दो जगह गोपद्म हैं। इससे यह माना जाता है कि स्वयं कामधेनु ने पावन ज्योतिर्लिंग पर दुग्धाभिषेक किया था।

मंदिर ट्रस्ट का मानना है कि यह इस संसार का एकमात्र पूर्वाभिमुख शिवलिंग या ज्योतिर्लिंग है, जिसमें स्वयं भोलेनाथ निवास करते हैं।

अन्य स्थानों की तुलना में श्री घृष्णेश्वर मंदिर का गर्भगृह काफी बड़ा माना जाता है।

यही कारण है कि यहां शिव भक्तों को अकेले या सामूहिक रूप से रुद्राभिषेक और पूजन आदि का सौभाग्य मिलता है।

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के ठीक सामने माता पार्वती की 3 से 3.5 फिट की सुंदर मूर्ति स्थापित है।

गर्भगृह से बाहर आने के बाद सभा मंडप में नंदीकेश्वर जी की भव्य प्रतिमा स्थापित है।

बगल में ही नवग्रह खंभा है।

यह भारतवर्ष का ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां भगवान घृष्णेश्वर जी की पूर्ण प्रदक्षिणा (परिक्रमा) होती है।

या यूं कहा जाए कि शायद यह भारत का एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है, जहां शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा की जाती है।

प्रदक्षिणा पथ पर चलते समय नगाड़ाखाना के बगल से भगवान भोलेनाथ के पूरे परिवार के दर्शन होते हैं।

जहां नंदी के ऊपर स्वयं भगवान श्री घृष्णेश्वर, उनके पीछे भगवान गणेश जी और माता पार्वती जी विराजमान हैं।

मुख्य पर्व और आकर्षण

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सबसे पहले आपको बता दें कि अग्नितत्वम होने की वजह से श्री घृष्णेश्वर मंदिर में होम और हवन जैसे कार्यक्रम नहीं होते हैं।

पर हां, सावन महीने के दौरान भारतभर से लाखों भक्त यहां दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

इस मंदिर में श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, द्वारका, गुजरात की तरह श्रद्धालुओं को अपने हाथों पंचामृत पूजन और रुद्राभिषेक करने का अवसर मिलता है।

जबकि अन्य शिव मंदिरों में ज्योतिर्लिंग को छूने नहीं दिया जाता है।

भक्तों को इस सुख से वंचित रहना पड़ता है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर श्री घृष्णेश्वर मंदिर में बहुत विशाल मेला लगता है।

उस दौरान मंदिर ट्रस्ट की ओर से एक भव्य और दिव्य पालकी निकाली जाती है।

भगवान श्री घृष्णेश्वर की प्रतिमा का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है।

उन्हें फूलों से सजी पालकी पर बिठाकर, बैंड-बाजे और बारातियों के साथ शिवालय सरोवर के पास लाया जाता है।

वहां भगवान को अष्ट तीर्थ स्नान करवाया जाता है।

रुद्राभिषेक और महापूजा की जाती है।

फिर उसी जोरशोर के साथ भगवान की प्रतिमा वापस मंदिर लाई जाती है।

उस समय भक्तों की संख्या अनगिनत होती है।

इस पालकी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बड़ी दूर-दूर से लोग आते हैं।

अन्य प्रमुख पर्व

इसके अलावा, हर सोमवार, प्रदोष, बैकुंठ चतुर्दशी और अधिक मास के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

शिव भक्तों को पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक, आदि कराने के लिए मंदिर में पर्याप्त विद्वान पुजारी उपलब्ध हैं।

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते समय पुरुषों को कमर के ऊपर का वस्त्र उतारना पड़ता है।

भोले भक्त शिव सेवा के साथ-साथ समाज सेवा की ज़िम्मेदारी भी निभाते हैं।

इसीलिए, मंदिर ट्रस्ट की ओर से हर मंगलवार को गरीबों और जरूरतमंदों के लिए ‘मुफ्त चिकित्सा शिविर’ का आयोजन किया जाता है।

और, हर दोपहर 12 से 1 बजे के बीच भक्तों के लिए प्रसाद की व्यवस्था की जाती है।

वार्षिक उत्सव का आयोजन

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चैत्र गुड़ीपड़वा के अवसर पर भगवान श्री घृष्णेश्वर जी को नए-नए पोशाख अर्पित किए जाते हैं और मंदिर में गुड़ी खड़ी की जाती है।

श्रावण मास के दौरान हर सोमवार को भगवान शिव जी का संपूर्ण रुद्री या रूद्र पाठ किया जाता है।

दोपहर पूजा के बाद भोलेनाथ को पोशाख चढ़ाया जाता है।

श्रावण मास की अमावस्या के दिन एलोरा गांव के लोग अपने बैलों (वृषभ) को श्री घृष्णेश्वर मंदिर में लाते हैं और अपने-अपने बैलों के साथ भगवान शिव जी की परिक्रमा करते हैं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस परिक्रमा से बैलों को किसी तरह की बीमारी नहीं होती है।

अग्नि मास

विजयादशमी के पावन अवसर पर भगवान श्री घृष्णेश्वर को नए वस्त्र चढ़ाए जाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि वैकुंठ चतुर्दशी पर स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु भगवान शिव से मिलने इस मंदिर में आते हैं।

उस दौरान रात 12 बजे से सुबह 3 बजे तक विशेष महापूजा का आयोजन किया जाता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी दिन भगवान शंकर जी को तुलसीपत्र और भगवान विष्णु जी को बेलपत्र चढ़ाया जाता है।

जैसा कि आपको पता ही होगा कि भगवान शिव जी को तुलसी का पत्ता नहीं चढ़ाया जाता है।

कार्तिक मास के पूर्णिमा के दिन शिव सरोवर के निकट भव्य दीपावली का आयोजन किया जाता है।

पौष मास के शुभ अवसर पर एलोरा गांव के सभी महिलाएं मंदिर में माता पार्वती जी को सौभाग्य अलंकार चढ़ाती हैं।

ऐसा माना जाता है कि इससे सुहागन का सुहाग सदा चमकता रहता है।

माघ मास के दौरान श्री घृष्णेश्वर मंदिर में भव्य महाशिवरात्रि का आयोजन किया जाता है।

अधिक मास को मलमास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

यह मास हर तीन साल के बाद आता है।

इस अवसर पर ब्रह्मवृंदों (मंदिर के पुजारियों) द्वारा ‘अतिरुद्र’ का आयोजन किया जाता है।

अतिरुद्र मतलब भगवान शिव जी का 14641 बार अभिषेक किया जाता है।

इस अभिषेक में अब तक पंचामृत, पुष्कर सरोवर जल, नर्मदा जल, प्रयागराज संगम जल, नारियल पानी और आमरस इत्यादि को शामिल किया जा चुका है।

आसपास क्या देखें?

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श्री घृष्णेश्वर मंदिर से लगभग पांच मिनट की दूरी पर श्री लक्ष विनायक मंदिर स्थित है।

इसे भारत का 17वां श्री गणेश पीठ माना जाता है।

इस प्राचीन मंदिर में भगवान श्री गणेश जी बैठी हुई मुद्रा में विराजमान हैं।

भगवान और मंदिर का मुख उत्तर दिशा की ओर यानी उत्तराभिमुख है।

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर और शिव सरोवर के साथ-साथ श्री लक्ष विनायक मंदिर का जीर्णोद्धार 17वीं सदी में महारानी अहिल्याबाई होलकर जी द्वारा कराया गया था।

कहानी श्री लक्ष विनायक जी की

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यह पवित्र और प्राचीन मंदिर जिस स्थान पर स्थापित है, उसे ‘काम्यक’ वन के नाम से जाना जाता है।

कहानी युगों-युगों पुरानी है। तारकासुर नाम का एक ताकतवर असुर महाशक्तिशाली बनने का स्वप्न बुन रहा था।

अपने लक्ष्य को पाने के लिए तारकासुर एक हजार वर्षों तक लगातार महादेव की तपस्या करता रहा।

यूं तो भगवान भोलेनाथ भाव से चढ़ाए गए एक लोटे जल में प्रसन्न हो जाते हैं।

चूंकि तारकासुर के इरादे नेक नहीं थे, इसलिए भगवान शंकर को खुश होने में हजार साल लग गए।

एक दिन तारकासुर की मेहनत रंग लाई। साक्षात् देवों के देव महादेव उसे वरदान देने के लिए प्रकट हुए।

तारकासुर बिना समय नष्ट किए मांग लिया बाबा भोले से अपना मनपसंद वरदान।

भगवान पार्वती पतये तथास्तु कहकर तुरंत अदृश्य हो गए।

महाशक्ति मिलते ही असुर खुद को देवताओं से बड़ा समझने लगा।

अपनी गिनती त्रिदेवों में करने लगा। करता भी क्यों नहीं?

वरदान के अनुसार उसका भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित कोई देवी-देवता वध नहीं कर सकते थे।

पर हां, माता पार्वती और भगवान शिव जी के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय जी मार सकते थे।

देवताओं के प्रधान सेनापति कार्तिकेय जी को दक्षिण भारत में ‘मुरुगन’ और ‘स्कंद’ भी कहा जाता है।

वरदान से बढ़ा अभिमान

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भगवान शिव से वरदान पाने के बाद तारकासुर के अत्याचार का पानी सिर के ऊपर बहने लगा।

सोचने-समझने की क्षमता शून्य हो गई। मानवता मर गई।

जिंदा था तो केवल अहंकार। फिर क्या था?

तीनों लोक में तारकासुर ने तांडव मचा दिया।

पूजा, यज्ञ, हवन, पूजन, अनुष्ठान, आदि पर रोक लग गई।

उसकी बात ना मानने वालों को मौत के घाट उतारा जाने लगा।

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अंत में हार मानकर सभी ऋषि-मुनि देवताओं के राजा इंद्रदेव जी के पास पहुंचें।

तारकासुर जैसे शक्तिशाली असुर की महाशक्ति देखकर इंद्रदेव जी ने इंसानों को बताया कि इसे स्वयं भगवान शिव जी ने वरदान दिया है।

इसलिए, इसे मारना हम जैसे देवताओं के लिए संभव नहीं है।

सभी भक्त चिंता में डूबे हुए थे। तभी उन्हें एक आकशवाणी सुनाई दी।

“इस महाशक्तिशाली दैत्य का वध केवल भगवान शिव के पुत्र स्कंद ही कर सकते हैं।

भगवान शंकर जी के पास जाइए। आप सबकी समस्या का समाधान केवल उन्हीं के हाथ में है।”

बिना समय गंवाए सभी पीड़ित कैलाश पर्वत पहुंच गए।

अर्धनारीश्वर भगवान ने उनकी वेदना सुनने और समझने के बाद अपने पुत्र कार्तिकेय को देवों का सेनापति नियुक्त किया।

उसके बाद देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया।

कहीं धनुष से तीरों की वर्षा हो रही थी।

तो कहीं तलवारें सिर से धड़ अलग कर रही थीं।

कई दिनों तक खूनी खेल चलता रहा।

भगवान स्कंद ने अपनी हर शक्ति आजमा ली, पर तारकासुर जीवित रहा।

भक्ति करो, शक्ति पाओ

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भगवान कार्तिकेय सहित सभी देवता भगवान शिव के शरण में खड़े थे। दोनों हाथ जोड़कर।

नीलकंठ भगवान उनकी समस्या सुन चुके थे। अब उपाय बता रहे थे।

“प्रथम पूज्य गणेश की पूजा-अर्चना के बिना आप सभी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।”

समझदार के लिए संकेत काफी था।

भगवान कार्तिकेय ने वन लौटकर शाडू की मिट्टी की भगवान गणेश जी की एक दिव्य प्रतिमा बनाई।

उसके बाद लक्ष दूर्वा (दूब घास), मोदक, आदि अर्पणकर विधिवत पूजा-अर्चना की।

अपने बड़े भ्राता की पूजा से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और तारकासुर पर विजय पाने में सहायता की।

तारकासुर के वध के बाद तीनों लोक में भगवान कार्तिकेय के शौर्य की चर्चा होने लगी।

साथ ही लक्ष विनायक भगवान की महिमा सदा के लिए अमर हो गई।

श्री गणेश पुराण और श्री मुद्गल पुराण के अनुसार एलोरा के काम्यक वन में श्री लक्ष विनायक जी की मूर्ति स्वयं भगवान कार्तिकेय ने स्थापित की थी।

यही वजह है कि श्री लक्ष विनायक मंदिर को भारत का 17वां श्री गणेश पीठ कहा जाता है।

भगवान श्री लक्ष विनायक जी के दर्शन मात्र से भक्तों को बुरी शक्तियों से लड़ने और जीतने की शक्ति मिलती है।

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर आने वाले हर श्रद्धालु बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने के बाद श्री लक्ष विनायक भगवान के दर्शन अवश्य करते हैं।

श्रीमंत मालोजी राजे भोसले स्मारक

श्री लक्ष विनायक मंदिर की दायीं तरफ श्रीमंत मालोजी राजे भोसले स्मारक है।

आप श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज जी के दादा जी और एलोरा गांव के मुखिया थे।

आज भी आपका घर वहां एक गढ़ी के रूप में मौजूद है।

महाराष्ट्र सरकार ने इस स्थान को अनमोल धरोवर के रूप में संजोया है।

इस स्थान पर पहुंचने के बाद सनातन धर्म पर गजब का गौरव महसूस होता है।

यहां भारी संख्या में पर्यटक फोटोग्राफी और विडियोग्राफी करते दिखाई देते हैं।

आकर्षण का केंद्र शिवालय सरोवर

भारतवर्ष में चार प्रमुख शिवालय सरोवर हैं।

1. कैलाश मानसरोवर, हिमालय।

2. ब्रह्मा सरोवर, पुष्कर, राजस्थान।

3. नारायण सरोवर, भुज, कच्छ, गुजरात।

4. शिवालय सरोवर, एलोरा, छत्रपति संभाजी नगर (पुराना नाम औरंगाबाद), महाराष्ट्र।

शिवालय सरोवर की अद्भुत कहानी

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कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव माता पार्वती से नाराज होकर दंडकारण्य के कामख्या वन में महेश माल की ओर निकल गए थे।

कई दिनों की लंबी प्रतीक्षा के बाद भगवान शंकर जब कैलाश नहीं लौटे तो माता पार्वती स्वयं उनसे मिलने पहुंच गईं।

भगवान त्रिपुरारी अपनी तपस्या में घर-संसार को भुलाए मग्न थे।

प्रभु को अचंभित करने के लिए देवी पार्वती जी ने ‘भिल्लीण’ का वेश धारण कर लिया था।

बहुत प्रयासों के बाद जब भगवान शिव ने अपने नेत्र खोले तो माता का यह रूप देखकर अचंभित और आकर्षित भी हुए।

शिकवे-शिकायत दूर होने के बाद जब शिव-पार्वती जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे।

माता पार्वती को बड़ी जोर की प्यास लगी।

यह बात जब महादेव को पता चली तो उन्होंने अपने त्रिशूल से बड़े जोर से धरती पर प्रहार किया और तुरंत गंगा की धारा बहने लगी।

उस पावन जल से देवी पार्वती ने अपनी प्यास शांत की।

उसके बाद से गंगा की वह धारा सदा के लिए अजर-अमर हो गई।

आज एलोरा में जो शिवालय सरोवर मौजूद है, उसकी उत्पत्ति स्वयं भगवान शिव द्वारा हुई है।

इस शिवालय सरोवर में आज भी अष्ट तीर्थ दिखाई देते हैं।

शिवालय सरोवर की मुख्य विशेषताएं

यह पवित्र शिव सरोवर एक एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है।

सरोवर के जल तक पहुंचने के लिए चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं।

ऊपर से लेकर नीचे तक कुल 56 सीढ़ियां हैं।

5+6=11 शुभ संख्या है।

सीढ़ियों में इस्तेमाल किए गए पत्थरों में कुछ लाल और कुछ काले पत्थर हैं।

काला पत्थर राजा एल के समय का प्रमाण देते हैं।

कहा जाता है कि पहले एलोरा गांव में एल नामक राजा का राज हुआ करता था।

एलोरा को एलूर और वेरुल भी कहा जाता है।

यह नाम उसी राजा के नाम पर बताया जाता है।

एक दिन एल राजा जंगल में शिकार खेलने गया था।

उस दौरान उसने देखा कि गाय का बछड़ा शेरनी का दूध पी रहा है और शेरनी का बच्चा गाय की थन से दूध पी रहा है।

यह अनोखा दृश्य देखकर एक बार तो उसे अपनी नज़रों पर यकीन नहीं हुआ।

पर, दूसरे ही क्षण उसने तीर चला दी।

देखते ही देखते सारा वातावरण शोक में बदल गया।

राजा जिसे जंगल समझ रहा था, वह गौतम ऋषि का आश्रम था।

और जिन प्राणियों की हत्या कर दी थी, गौतम मुनि ने उन्हें बड़े लाड-प्यार से पाला था।

गौतम ऋषि ने एल राजा को तुरंत श्राप देते हुए कहा कि तेरे शरीर में कृमि पड़ जाए।

और हुआ वही। राजा के शरीर में कीड़े पड़ गए।

यह भी देखें: प्रथम ज्योतिर्लिंग की महिमा

पाप मुक्ति का सरोवर

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काफी वर्षों तक राजा यह पाप लेकर इधर-उधर भटकते रहा।

एक दिन जंगल में भटकते समय राजा को बहुत जोर की प्यास लगी।

प्यास बुझाने के लिए वह यहां-वहां नजरें दौड़ाकर देखने लगा।

तभी उसकी निगाह एक गोपद्म पर पड़ी, जिसके मुख से थोड़ा-थोड़ा जल निकल रहा था।

राजा बिना समय गंवाए उस गोमुख के पास पहुंच गया और अपनी दोनों अंजुली में जल भरकर पीने लगा।

उसी दौरान राजा ने देखा कि वह जल जहां-जहां उसके शरीर पर गिर रहा है।

वहां-वहां उसके शरीर के अंग कृमि रोग से मुक्त हो रहे हैं।

इस तरह राजा भगवान शिव द्वारा उत्पन्न किए गोपद्म के जल से स्नान करने के बाद पूरी तरह ठीक हो गया।

राजा ने करवाया सरोवर का निर्माण

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पृथ्वी के मुख से आते जल का रहस्य जानने के लिए राजा काफी समय तक जल के उद्गम स्थान को खोजता रहा, लेकिन निराशा हाथ लगी।

राजा एल की जानने की जिज्ञासा बहुत प्रबल थी।

इसलिए उसने उसी स्थान पर भगवान ब्रह्मा जी की तपस्या शुरू कर दी।

कई सालों तक राजन की कठोर तपस्या से ब्रह्मदेव जी प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हुए।

हालांकि भगवान ब्रह्मा जी राजा एल की इच्छा अच्छी तरह से समझ रहे थे।

फिर भी अंजान बनते हुए राजा से पूछा – “बता राजन! क्या वरदान चाहिए तुझे?”

“हे प्रभु! सर्वप्रथम आप अपने इस दास का प्रणाम स्वीकार कीजिए।”

राजा ने भगवान ब्रह्मा जी को दंडवत प्रणाम करने के बाद कहा – “मुझे केवल यह जानना है भगवन कि इस जल का उगम कहां है?”

“यह महादेव द्वारा उत्पन्न किया ‘शिव सरोवर’ है, जो समय के साथ बुझने की कगार पर है।

इस सरोवर में अष्ट तीर्थ विराजमान हैं।

तू इस सरोवर का जीर्णोद्धार करा। तेरे साथ-साथ समस्त सृष्टि का कल्याण होगा।”

यह कहकर भगवान ब्रह्मा जी अंतर्धान हो गए।

राजा ने भगवान के बताए आदेश का पालन किया।

शिव सरोवर के साथ-साथ अष्ट तीर्थों की स्थापना की।

तब से अब तक एलोरा में स्थित इस शिवालय सरोवर की महिमा और गरिमा बड़ी तेजी से बढ़ती चली जा रही है।

माना जाता है कि इस सरोवर में स्नान करने से सभी प्रकार के जीवों को अपने कष्टों से मुक्ति मिलती है।

शिवालय सरोवर की अन्य विशेषताएं

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यह भारत का ऐसा शिव सरोवर है, जहां अष्ट तीर्थ निवास करते हैं।

सरोवर की बनावट और सजावट बेहद सुंदर है।

इस सरोवर के जल को साल में एक या दो बार निकाला जाता है।

उस दौरान औदुंबर और जामुन की लकड़ी का आधार और सरोवर के मध्य में एक गोपद्म दिखाई देता है।

वहां से जल का स्रोत दिखता है।

सरोवर की हर दीवार पर 2-2 कमरे मौजूद हैं, ताकि शिव सरोवर में स्नान करने के बाद श्रद्धालु अपने कपड़े बदल सकें।

महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव जी की प्रतिमा को इसी सरोवर में स्नान कराया जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर अष्ट तीर्थों के सम्मान में भव्य दीपावली मनाई जाती है।

उस समय का नजारा बेहद खूबसूरत होता है।

Grishneshwar Temple Timings

मंदिर खुलने और बंद होने का समय

दिन मंदिर खुलने का समय मंदिर बंद होने का समय
प्रतिदिन सुबह 5 बजेरात 9 बजे
सभी सावन सोमवारसुबह 4 बजेरात 9 बजे
बैकुंठ चतुर्दशीसुबह 5 बजेअगले दिन की सुबह 3 बजे
महाशिवरात्रिसुबह 4 बजेपूरी रात

आरती का समय

सुबह 5 बजे दोपहर 12 बजेरात 8 बजे

दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक जलाभिषेक बंद रहता है।

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मंदिर ट्रस्ट की ओर से मंदिर के जस्ट बगल भक्तों के लिए बड़ी धर्मशाला, कमरे और मंगल कार्यालय की सुविधा मौजूद है।

धर्मशाला में 6 बड़े हॉल और 6 रूम यात्रियों की सेवा में समर्पित हैं।

प्रति हॉल में 50 लोगों के रहने की क्षमता है।

सांस्कृतिक हॉल में एक समय में 1000 भक्तगण कथा और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद ले सकते हैं।

भक्तों की सुविधा के लिए विश्वत मंडल की ओर से 500 कमरे बनवाने की योजना प्रस्तावित है।

इसके अलावा, औरंगाबाद में सभी प्रकार के होटल और लॉज की सुविधाएं मौजूद हैं।

बाहर से आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु औरंगाबाद में होटल लेकर रुकते हैं।

फ्रेश होने के बाद होटल के जस्ट बगल से निजी टैक्सी, ऑटो, आदि रिजर्व करके श्री घृष्णेश्वर मंदिर पहुंचते हैं।

दिनभर दर्शन, पूजन और भ्रमण करने के बाद लोग शाम को होटल लौट आते हैं।

औरंगाबाद में लगभग सभी होटल रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही मौजूद हैं।

होटल का किराया सीजन के ऊपर निर्भर करता है।

Aurangabad to Grishneshwar Temple Distance

सड़क मार्ग द्वारा: औरंगाबाद से श्री घृष्णेश्वर मंदिर की दूरी लगभग 30 किमी है।

भगवान शिव का यह 12वां ज्योतिर्लिंग औरंगाबाद के एलोरा गांव यानी एनएच 211 पर स्थित है।

एलोरा से शिरडी की दूरी लगभग 110 किमी, श्री शनि शिंगणापुर 120 किमी, धुलिया 120 किमी, पुणे 240 किमी, मुंबई 400 किमी, इंदौर 400 किमी, सूरत 350 किमी और हैदराबाद 500 किमी है।

बस द्वारा: श्री घृष्णेश्वर मंदिर, एलोरा पहुंचने के लिए औरंगाबाद बस स्टैंड के प्लेटफॉर्म नंबर 8 से बस सेवा ले सकते हैं।

आप धुलिया, इंदौर, सूरत आदि जाने वाली किसी भी बस में सवार होकर एलोरा गांव में उतर सकते हैं।

रेल द्वारा: श्री घृष्णेश्वर मंदिर का प्रमुख रेलवे स्टेशन औरंगाबाद है, जिसका स्टेशन कोड AWB है।

औरंगाबाद मुंबई, दिल्ली, अमृतसर, नागपुर, हैदराबाद, सिकंदराबाद, नांदेड़ और मनमाड़ से बड़ी आसानी से पहुंचा जा सकता है।

मुंबई से औरंगाबाद के लिए वंदे भारत और जनशताब्दी एक्सप्रेस सहित चार और ट्रेनें उपलब्ध हैं।

प्लेन द्वारा: श्री घृष्णेश्वर मंदिर का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट औरंगाबाद है।

मुंबई और दिल्ली के लिए औरंगाबाद से नियमित विमान सेवाएं उपलब्ध हैं।

औरंगाबाद में और क्या प्रसिद्ध है?

Grishneshwar Temple History, Jyotirlinga Story, Timings, Near Hotels & Aurangabad to Distance in Hindi:

1. 52 दरवाजों का शहर

2. भद्रा मारुती मंदिर (लेटे हुए हनुमान जी)

3. एलोरा की रहस्यमयी गुफाएं

4. पनचक्‍की (पाणचक्की)

5. बीबी का मक़बरा (ताज महल की आकृति पर बना)

6. बानी बेगम गार्डन

यह भी देखें: श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के बारे में कुछ बेसिक जानकारी विकिपीडिया पर मौजूद है।

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