Holi 2024: रीति पुरानी, रंग नए

Holi 2024: यह सिर्फ़ आर्टिकल नहीं, होली की कहानी (Holi ki Kahani) का आईना है।
तो चलिए, जानते हैं कि होली क्यों मनाते हैं और होली 2024 में कब है (Holi 2024 Mein Kab Hai?)

होली क्यों मनाते हैं?

Holi 2024: कई युग आए, कई दौर गए, पर समय के साथ जिसके रंग निखरते चले गए, वो होली है। भारत का 39 लाख वर्ष पुराना त्योहार, जिसके रंगों की छाप पूरी दुनिया के दिलों में दिखाई देती है। तभी तो होली की मिठास का आनंद उठाने के लिए लगभग दुनियाभर के सैलानी भारत पहुंचते हैं। चलिए, जानते हैं कि होली क्यों मनाते हैं?

होली की कहानी (Holi ki Kahani)

Holi 2024: 36,000 वर्षों की कठिन तपस्या के आगे मजबूर होकर, भगवान ब्रह्मा जी को वरदान देने के लिए सामने आना ही पड़ा। “हे ब्रह्मदेव! जैसा कि मुझे पता है कि आप अमरता का वरदान किसी को नहीं देते हैं। इसलिए, मैं आपसे अमरत्व का वरदान बिल्कुल नहीं मांगूंगा।“ हिरण्यकश्यप ने विनम्र भाव से कहा।

सृष्टि के रचयिता के सामने सफेद झूठ बोलते हुए ‘हिरण्यकरण वन’ के राजा की जुबान बिल्कुल भी नहीं लड़खड़ाई। “वरदान मांगों हिरण्यकश्यप! मैं तुम्हारी अति कठोर तपस्या से प्रसन्न हूं।“ ब्रह्मदेव जी ने मन-ही-मन हंसते हुए कहा।

“न मुझे कोई मानव मार सके और ना ही कोई पशु। न मेरी मृत्यु दिन में हो और न ही रात के समय हो। न मुझे कोई घर के भीतर मार सके और न ही घर के बाहर। न धरती पर और न ही आकाश में। और न ही मेरी मृत्यु किसी अस्त्र-शस्त्र से हो।“ हिरण्यकश्यप ने बिना समय गंवाएं अपनी नज़रों में अमरत्व वाला वरदान मांग लिया। भगवान ब्रह्मा जी तथास्तु कहकर चले गए।

मिला वरदान, घमंड पहुंचा सातवें आसमान

Holi ki Kahani: वरदान पाते ही सबसे पहले तो हिरण्यकश्यप का घमंड सातवें आसमान में पहुंच गया। वह स्वयं को भगवान से बढ़कर समझने लगा। आम मनुष्य उसकी नज़रों में गाजर-मूली हो गए। वह जब चाहता, जिसे चाहता, मिनटों में मसल देता। अहंकार की पराकाष्ठा में डूबा राजा धीरे-धीरे अपने पतन की ओर बढ़ने लगा। उसने अपनी समस्त प्रजा को आदेश दिया कि अब से भगवान की नहीं, मेरी पूजा होगी।

जो व्यक्ति राजा के इस आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे केवल मृत्युदंड मिलेगा। जिन लोगों को स्वयं के जीवन से प्रेम था, वे उसकी शरण में चले गए। उसे भगवान मानकर पूजने लगे। पर, जिन लोगों को ईश्वर से प्रेम था, उन पर विश्वास था, उन्होंने भक्ति का मार्ग चुना। बदले में उन्हें भले ही दर्दनाक मौत मिली। सीधे-सादे साधु-संतों की हत्या और भोलेभाले प्रजा के नरसंहार से तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई।

अहंकार एक लाइलाज बीमारी है। यह मनुष्य की बुद्धि को इस तरह ‘हर’ लेता है कि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। वरदान पाने के बाद यही रोग हिरण्यकश्यप को हो गया था। वह अहंकार रूपी बीमारी से ग्रसित होकर, स्वयं को त्रिदेवों से श्रेष्ठ समझने लगा। अपनी शक्तियों का गलत उपयोग करते हुए अपनी राक्षसी प्रवृत्ति से लोगों को डराने लगा।

‘विनाश-काले विपरीत बुद्धि’ अर्थात् विनाश के समय मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। भगवान के भक्तों को कोई डराएगा, धमकाएगा, सताएगा या रुलाएगा, तो क्या त्रिदेव चुप बैठेंगे? नहीं ना! विधि का विधान बन गया। समय के साथ हिरण्यकश्यप के विनाश का पहिया जुड़ गया।

विनाश के रूप में प्रहलाद ने लिया जन्म

Holi 2024: हिरण्यकश्यप के अत्याचार से तीनों लोक में भय का वातावरण बना हुआ था। ‘असुर संस्कृति’ हर दिन नया इतिहास लिख रही थी। ऐसे समय में उस असुर कुल में ‘प्रहलाद’ नामक एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ। बालक जैसे-जैसे बड़ा हुआ, उसके तेज और तप के चर्चे घर-घर होने लगे।

बढ़ते बालक के साथ हिरण्यकश्यप का दुर्भाग्य भी बढ़ने लगा। प्रहलाद बचपन से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनका मानना था कि उनका जन्म श्री हरि विष्णु की सेवा और पूजा के लिए हुआ था। लेकिन, पिता हिरण्यकश्यप की सोच पुत्र से परे थी। प्रहलाद जिन्हें अपना प्रिय आराध्य मानते थे। असुरराज हिरण्यकश्यप उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु समझता था।

हिरण्यकश्यप श्री विष्णु को शत्रु क्यों मानता था?

Holi ki Kahani: जब-जब पृथ्वी पर बुरी शक्तियों का प्रकोप बढ़ता है, तब-तब भगवान अवतार लेकर उन बुराइयों का नाश करते हैं। संसार को बचाने के लिए श्री हरि विष्णु ने कई बार पृथ्वी पर अवतार लिया है। उनमें से एक अवतार ‘वराह’ का माना जाता है।

यह कथा सतयुग की है। पृथ्वी दैत्य ‘हिरण्याक्ष’ के नाम से कांपती थी। एक बार उसने अपनी दिव्य शक्तियों का गलत उपयोग करते हुए पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया। तब भगवान ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु ‘वराह’ रूप में अवतरित हुए। भगवान वराह ने राक्षस हिरण्याक्ष का वध करके, अपने दांतों पर पृथ्वी को वापस सतह पर ले आए। इस प्रकार उन्होंने वराह का अवतार लेकर पृथ्वी की सुरक्षा की।

जिस राक्षस हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु ने वध किया था, वह हिरण्यकश्यप का छोटा भाई था। छोटे भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद से हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु सहित सभी देवताओं से घृणा करने लगा। अपने बदले की आग को बुझाने के लिए ही उसने कठोर तपस्या करके अमरत्व जैसा वरदान मांगा था।     

जब पुत्र ने पिता को परास्त किया

Holi 2024: प्रहलाद के जन्म लेने के बाद प्रत्येक पिता की तरह ही हिरण्यकश्यप की भी आशाएं जगी थीं। वह चाहता था कि उसका पुत्र उसकी पूजा करे। उसे भगवान माने और उसकी हर आज्ञा का पालन करे। भले ही प्रहलाद का जन्म असुर-कुल में हुआ था। लेकिन, उनकी सोच और प्रकृति देवों वाली थी।

भगवान विष्णु अपने प्रहलाद के रोम-रोम में बसते थे। जिनकी हर सांस में श्री हरि का निवास हो, वह व्यक्ति असुर प्रवृत्ति वाला हो ही नहीं सकता। एक आज्ञाकारी पुत्र होने के नाते प्रहलाद ने कई बार अपने पिता को समझाया कि देवताओं से बैर करना ठीक नहीं। कमजोरों और लाचारों को सताना या पीड़ा देना अच्छी बात नहीं हैं।

हमें सभी जीवों से उसी तरह प्रेम करना चाहिए, जिस तरह हम अपने प्राण से करते हैं। हमें अच्छे कर्मों, ज्ञान और पूजा-ध्यान के जरिए ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। अहंकारी व्यक्ति हमेशा शंकित और असंतुष्ट रहता है। मानसिक संतुलन हमेशा बिगड़ा हुआ रहता है। चेहरे पर हर समय तनाव के बादल देखे जा सकते हैं। और सबसे खास बात, वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता।

तर्कहीन सवालों के जरिए शास्त्रों का अपमान करता है। ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाता है। स्वयं को त्रिदेवों से बढ़कर समझता है। यही दशा उस समय असुरराज हिरण्यकश्यप की थी। उसे ब्रह्मांड की कोई शक्ति समझा नहीं सकती थी। शायद वह जगत का सबसे अधिक समझदार ‘जीव’ था। कई बार पिता ने पुत्र को समझाया और पुत्र ने पिता को समझाया, बात नहीं बनी।

बुराई पर अच्छाई की जीत

Holi ki Kahani: पिता चाहता था कि बेटा उसकी पूजा करे। बेटा कहता था कि उसका जन्म केवल श्री हरि का ध्यान करने के लिए हुआ है। आप भी भगवान विष्णु की शरण आ जाइए। वे परम दयालु हैं, आपकी हर गलती क्षमा कर देंगे। आपको अपने श्री चरणों में स्थान देंगे।

पिता राजा था। वरदान के अहंकार में चूर था। उसने अपने ही पुत्र की हत्या की आज्ञा दे दी। हिरण्यकश्यप के क्रूर सैनिकों ने प्रहलाद को मारने के अनगिनत प्रयास किए, लेकिन हर बार असफल रहे। वे जितनी बार मारने की कोशिश करते, भगवान विष्णु अपने भक्त को बचा लेते। भगवान की इस अद्भुत लीला से जहां संसार का सर्वशक्तिशाली असुर राज हैरान था, वहीं उसके सैनिक लाचार थे।

जिनकी आस्था ईश्वर के प्रति अटूट रहती है, भगवान हर हाल में उनका ख्याल रखते हैं। प्रहलाद ‘श्री विष्णु’ भक्त थे और ईश्वर में उनकी आस्था अनकही थी। तभी तो हिरण्यकश्यप जितने बार भी प्रहलाद को मारने का प्रयास करता, भगवान हर बार बचा लेते। तब उसने अपनी बहन होलिका का सहारा लिया।

होलिका कौन थी?

Holi 2024: महर्षि कश्यप और दिति की कन्या होलिका को अग्निदेव ने वरदान दिया था कि उन्हें अग्नि कभी जला नहीं सकेगी। होलिका राक्षस कुल के राजा हिरण्यकश्यप की भले बहन थी, लेकिन वह अग्निदेव की उपासक थी। अग्निदेव ने होलिका को वरदान में एक ऐसा वस्त्र दिया था, जिसे धारण करने के बाद अग्नि जला नहीं सकती थी।

हिरण्यकश्यप जब हर पैतरा आजमाकर हार गया, तो उसने होलिका की ओर रुख किया। असुरराज ने प्रहलाद को जिंदा जला देने का आदेश दिया। जैसा कि बुआ होलिका ने भतीजे प्रहलाद को बड़े लाड-प्यार से पाला-पोसा था। बड़े भाई का आदेश मानने से पहले लाडली बहना ने उन्हें समझाने का पूरा प्रयास किया, लेकिन विफल रही।

हिरण्यकश्यप ने होलिका को डरा-धमकाकर प्रहलाद को अपनी गोद पर बैठाकर अग्नि में भस्म कर देने का आदेश दिया। भाई हिरण्यकश्यप के आदेश का पालन करते हुए होलिका अपने प्यारे भतीजे प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर जलती अग्नि-कुंड में बैठ गई। हैरानी की बात यह थी कि ऐसा नीच काम करते हुए एक पिता का ह्रदय कांपा नहीं, बल्कि अहंकार से मुस्कुराया।

लेकिन, भगवान की माया आज तक कोई समझ पाया है क्या? जिस अग्नि में प्रहलाद को भस्म होना था, उसमें होलिका स्वयं जल गई। जिस वस्त्र को अग्निदेव ने होलिका को अपनी सुरक्षा के लिए दिया था, वही प्रहलाद का सुरक्षा कवच बन गया।

भगवान विष्णु ने लिया नरसिंह अवतार

Holi ki Kahani: वरदानी बहन होलिका जलकर राख हो गई। बेटा प्रहलाद अग्नि से सुरक्षित बच गया। लेकिन, हिरण्यकश्यप के बदले की आग कम नहीं हुई। अहंकार की ऊंचाई एक प्रतिशत भी नहीं घटी। बढ़ा, तो केवल गुस्सा, पाप और विनाश। इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी अहंकारी की आंखें नहीं खुलीं।

उसने अपने बेटे को स्वयं के हाथों से मिटाने का संकल्प लिया। उधर भक्त प्रहलाद पर हिरण्यकश्यप के अत्याचार की सभी सीमाएं जब पार हो गईं, तब भगवान विष्णु को ‘नरसिंह’ अवतार लेना पड़ा। क्योंकि, उन्हें भगवान ब्रह्मा के वरदान का पालन करना था। अपने भक्त को बचाना और हिरण्यकश्यप के पाप से पृथ्वी को छुड़ाना था।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए भगवान नरसिंह ने दिन और रात के बीच के समय में आधे मनुष्य और आधे शेर का रूप धारणकर, खंभा फाड़कर ‘नरसिंह’ अवतार में प्रकट हुए। फिर बिना समय गंवाए उन्होंने हिरण्यकश्यप को मुख्य दरवाजे के बीच अपने पैर पर लिटा दिया। उसके बाद शेर की तरह अपने धारदार नाखूनों से उसका पेट फाड़कर वध कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने भक्त प्रहलाद सहित समस्त मानव कुल की रक्षा की।

ऐसे शुरू हुई होली मनाने की प्रथा

Holi ki Kahani: जब भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप रूपी अहंकार का वध कर दिया। सृष्टि को उसके अत्याचारों से मुक्ति प्रदान कर दिया। तब उसके अगले दिन भव्य ‘होली’ मनाई गई। उसके बाद से हर वर्ष ‘होलिका दहन’ के साथ ‘होली’ मनाने की प्रथा शुरू हुई।

होलिका से जुड़ा होने के कारण यह त्योहार आगे चलकर ‘होली’ कहा जाने लागा। ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ के प्रतीक के रूप में होली सतयुग से मनाई जाती रही है।

होली क्यों मनाते हैं?

इसके अलावा, होली की कहानी शिव-पार्वती और कामदेव-रति से भी जुड़ी मानी जाती है। कहते हैं कि संसार की सबसे पहली होली भगवान शिव द्वारा खेली गई थी। वह होली कामदेव को दोबारा जीवित करने की खुशी में मनाई गई थी, जिसमें देवी रति सहित सभी देवी-देवताओं ने हिस्सा लिया था।

उसके बाद, श्री कृष्ण युग में होली को नई पहचान मिली थी। श्री राधा-कृष्ण की होली के किस्से सभी जगह पढ़े जा सकते हैं। मान्यता है कि फुलेरा दूज के अवसर पर पहली बार भगवान श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी और गोपियों के साथ फूलों की होली खेली थी। तब से आज तक ब्रज में फुलेरा दूज पर श्री राधा-कृष्ण के भक्त उनके साथ फूलों की होली खेलते हैं। फुलेरा दूज को फाल्गुन मास का सबसे पवित्र दिन माना जाता है।

उम्मीद है कि इस लेख को पढ़ने के बाद आप यह समझ गए होंगे कि होली क्यों मनाते हैं? और क्यों यह त्योहार हमें सदियों से प्रेरित और गौरवान्वित करती आई है? चलिए, अब जानते हैं कि होली 2024 में कब है (Holi 2024 Mein Kab Hai)?

होली 2024 में कब है?

Holi 2024 Mein Kab Hai: होली पूरे भारत में मनाया जाने वाला सबसे भव्य त्योहार है। अगर इस बार होली कहीं और मनाने का प्लान बना रहे हैं, तो एडवांस में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि होली 2024 में कब है?

इस साल होलिका दहन 24 मार्च, 2024 (रविवार) को किया जाएगा। रंगों का त्योहार होली 25 मार्च, 2024 (सोमवार) को मनाई जाएगी। होलिका दहन हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को किया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से होली खेलने की परंपरा है।

Holi 2024 Mein Kab Hai: रंगों और गुलालों के साथ भांग के रस, गीत, संगीत, नृत्य आदि इस त्योहार में खुशियों के अनगिनत रंग भर देते हैं। होली बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। इसलिए इस होली, अपने अंदर की बुराई को अच्छाई के रंगों से धो डालें।

होली की तिथि नोट करने के बाद, अगले लेख में जानिए कि इस बार भव्य, दिव्य और यादगार होली का आनंद कहां उठाएं?

इस आर्टिकल में आपने जाना होली की कहानी (Holi ki Kahani), होली क्यों मनाते हैं और होली 2024 में कब है (Holi 2024 Mein Kab Hai)।

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