Shardiya Navratri 2023: नवरात्रि की अनसुनी बातें, जो सब नहीं जानते

Shardiya Navratri 2023: सनातन की शान और हर हिंदू की धड़कन है नवरात्रि। नारी शक्ति की पहचान और आस्था, विश्वास एवं भक्ति का महोत्सव है नवरात्रि। धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में जिसका उल्लेख मिलता है, वह व्रत है नवरात्रि। जिस प्रथा का पालन स्वयं भगवान श्री राम ने किया, वह पावन पर्व है नवरात्रि। क्या आप जानते हैं कि शारदीय नवरात्रि क्यों मनाते हैं?

शारदीय नवरात्रि क्यों मनाते हैं?

Shardiya Navratri 2023: बात उन दिनों की है, जब असुरों के राजा रंभ को एक भैंस से प्रेम हो गया था।

असुर और जानवर के मिलन से महिषासुर नामक एक खूंखार असुर का जन्म हुआ।

महिषासुर को रूप बदलने का हुनर अपने माता-पिता से विरासत में मिला था।

वह अपनी इच्छानुसार मानव, दानव और भैंस का अवतार बड़े आराम से ले लेता था

असुर महिषासुर बचपन से ही भगवान ब्रम्हा का परम भक्त था।

उसने अपनी कठोर तपस्या से सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रम्हा को प्रसन्न किया।

बदले में भगवान ने उसे यह वरदान दिया कि देवता, दानव और मनुष्य कोई भी उसे हरा नहीं सकेगा।

कोई अस्त्र-शस्त्र उसे मार नहीं सकेगा।

अपने वरदान के अहंकार में चूर महिषासुर ने पृथ्वी लोक जीतने के बाद, देवताओं को हराकर स्वर्ग लोक पर कब्ज़ा कर लिया।

राजा इंद्रदेव सहित सभी देवगण को अपमान के साथ अपना स्वर्ग लोक छोड़ना पड़ा।

अपना साम्राज्य बचाने के लिए देवताओं के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था।

उनके पास जितनी शक्तियां थीं, महिषासुर पर असर नहीं कर रही थीं।

करती भी कैसें? उसके ऊपर भगवान ब्रम्हा जी द्वारा दिया वरदान सुरक्षा-कवच के रूप में काम कर रहा था।

लेकिन, उसके प्रहार का असर देवताओं पर बराबर कर रहा था।

कई युद्ध हारने के बाद देवताओं को पृथ्वी पर इधर-उधर भटकना पड़ा रहा था।

आखिर में देवगणों को अपनी सहायता के लिए भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश के शरण पहुंचना पड़ा।

जिन्होंने दर्द दिया है, वही दवा भी देंगे। यानी जिन्होंने वरदान दिया है, वही उपाय भी बताएंगे।

भगवान ब्रह्मा के वरदान के अनुसार, महिषासुर की मृत्यु मानव, दानव और देवता के हाथों संभव नहीं थी।

लेकिन, एक स्त्री के हाथों उसकी मृत्यु हो सकती थी।

देवी भगवती ने लिया अवतार

Shardiya Navratri 2023: महिषासुर के प्रकोप से देवताओं को पृथ्वी पर शरण लेना पड़ा था।

भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने उसे उसके द्वारा किए जा रहे अधर्म कार्यों के लिए समझाया।

वह नहीं माना। अभिमानी व्यक्ति अपनी ज़िद के आगे दूसरों की कहां सुनते हैं।

उसे यह घमंड था कि कोई देवता या दानव उसे मार नहीं सकता है।

वह सदा के लिए अजर-अमर हो चुका है, देवताओं की तरह।

कई बार समझाने के बाद जब बात नहीं बनी, तो त्रिदेव के मुख से क्रोध रूपी एक ज्वाला प्रकट हुई।

उसके बाद वह शक्ति अन्य देवताओं के शरीर से उत्पन्न हुई शक्ति में मिलकर मां भगवती की उत्पत्ति हुई।

सभी देवताओं के तेज पुंज से प्रकट हुई देवी को ‘महिषासुर मर्दिनी’ कहा गया।

महिषासुर के अंत के लिए सबसे पहले देवों के देव महादेव ने मां भगवती को दिव्य त्रिशूल प्रदान किया।

भगवान शिव के प्रिय नारायण, संसार के पालनहार भगवान विष्णु ने देवी को सुदर्शन चक्र से सुसज्जित किया।

देवराज इंद्र ने अपना वज्र दिया। सूर्यदेव ने ढाल, तलवार और एक दिव्य शेर मां को सवारी के लिए अर्पित किया।

भगवान विश्वकर्मा ने कई दिव्य कवच और अस्त्र सहित सभी प्रकार के छोटे-बड़े अस्त्रों से शोभित किया।

इस प्रकार सभी देवताओं ने कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से महिषासुर मर्दिनी को सशक्त किया।

महिषासुर मर्दिनी का महिषासुर से युद्ध

Shardiya Navratri 2023: कहा जाता है कि महिषासुर ने देवी भगवती से युद्ध जीतने के लिए कई असुरों के साथ गठबंधन किया था।

उसकी पार्टी में उदग्र नामक एक महादैत्य अपने 60 हजार राक्षसों के साथ युद्ध के मैदान में था।

महानु नामक महादैत्य एक करोड़ दैत्यों के साथ देवताओं को चुनौती दे रहा था।

वहीं पांच करोड़ राक्षसों के साथ अशीलोमा नामक दैत्य और 60 लाख सैनिकों के साथ वास्कल नामक राक्षस युद्ध के लिए हुंकार रहा था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार यह कहा जाता है कि वह युद्ध पूरे 9 दिनों तक चला था।

उस दौरान सभी देवताओं ने नौ दिनों तक प्रतिदिन पूजा-पाठ के जरिए देवी की शक्ति बढ़ाते रहें।

महिषासुर के वध के लिए लगातार बल प्रदान करने के लिए हवन आदि करते रहे।

सभी दानवों के पाप से धरती को मुक्त करने के बाद दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया।

मां ने सिर्फ़ महिषासुर का वध ही नहीं, बल्कि सभी बुरी असुरी शक्तियों का विनाश कर दिया था।

मान्यता है कि जिस समय माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। उस समय आश्विन माह चल रहा था।

उसी समय से सनातन धर्म में नवरात्रि के पावन पर्व को मनाने की प्रथा शुरू हुई।

यही वजह है कि हर साल आश्विन माह की प्रतिपदा से लेकर पूरे नौ दिनों तक भारतभर में नवरात्रि का भव्य त्योहार मनाया जाता है।

नवरात्रि का यह पर्व भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है।

आश्विन माह में मनाए जाने वाले नवरात्रि उत्सव को ‘शारदीय नवरात्रि’ के नाम से जाना जाता है।

भगवान श्री राम से संबंधित है नवरात्रि का त्योहार

Shardiya Navratri 2023: कहा जाता है कि रावण को हराने और माता सीता को छुड़ाने के लिए भगवान श्री राम ने 9 दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना से उन्हें प्रसन्न किया था।

दसवें दिन मां भगवती ने प्रकट होकर प्रभु श्री राम को विजय श्री का आशीर्वाद दिया था।

उसी दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध करके धरती और माता सीता को उसके चंगुल से आज़ाद किया था।

उसके बाद से भारतवर्ष में नवरात्रि मनाने की परंपरा शुरू हुई।

यही कारण है कि नवरात्रि के दसवें दिन रावण का पुतला दहन करके विजयादशमी या दशहरा मनाया जाता है।

देवी भागवत पुराण में भगवान श्री राम द्वारा शारदीय नवरात्रि व्रत, पूजन और शक्ति का वर्णन मिलता है।

क्यों कहते हैं शारदीय नवरात्रि

Shardiya Navratri 2023: आश्विन मास में शरद ऋतु की शुरुआत होती है।

यही वजह है कि आश्विन मास की नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

शारदीय नवरात्रि के दौरान देवी भक्त अपने घर में कलश की स्थापना करते हैं।

प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा की पूजा-आरती करते हैं।

कलश स्थापित करने वाले भक्त पूरे 9 दिनों तक व्रत करते हैं।

मां दुर्गा की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

जिन पर मां दुर्गा का आशीर्वाद बना रहता है, वह हर चुनौती को जीत लेता है।

नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा कई रूपों में की जाती है।

पश्चिम बंगाल में इस नवरात्रि के समय दुर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है।

यह पर्व महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि जगहों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है।

नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है और इन नौ रूपों का विशेष महत्व है।

चलिए जानते हैं उनके नाम और महत्त्व के बारे में।

मां दुर्गा के नौ रूप

Shardiya Navratri 2023: नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती है।

उनमें पहले दिन मां की आराधना शैलपुत्री के रूप में की जाती है।

नवरात्रि के दूसरे दिन मां की पूजा ब्रह्मचारिणी के रूप में की जाती है।

इसी तरह तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवें दिन स्कंद माता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री के स्वरूप में मां दुर्गा की पूजा की जाती है।

श्लोक

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

अर्थ

पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंद माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री।

यही मां दुर्गा के 9 रूप हैं।

शैलपुत्री माता

शारदीय नवरात्रि 2023: हिमालय को शैलेंद्र या शैल भी कहा जाता है। शैल का अर्थ पहाड़, चट्टान, पर्वत आदि होता है।

देवी दुर्गा ने हिमालय की पुत्री यानी पार्वती के रूप में जन्म लिया था। उनकी मां का नाम देवी मैना था।

हिमालय की बेटी होने के कारण देवी दुर्गा का पहला नाम शैलपुत्री पड़ा।

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है।

मां शैलपुत्री हमें सिखाती हैं कि जीवन में सफल बनने के लिए इरादे चट्टान की तरह मजबूत होने चाहिए।

हर चुनौती का सामना डटकर करना चाहिए।

कहा जाता है कि मां के इस रूप का पूजन करने से धन और रोजगार में बढ़ोतरी होती है।

अच्छी सेहत, सफलता और यश की प्राप्ति होती है।

मां शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण करती हैं।

नवरात्रि के पहले दिन इनके पूजन के साथ भक्त के 9 दिन की यात्रा शुरू होती है।

ब्रह्मचारिणी माता

शारदीय नवरात्रि 2023: मां दुर्गा के 9 स्वरुपों में मां ब्रह्मचारिणी द्वितीय स्वरूप हैं।

ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या। यानी कठोर तपस्या करने वाली देवी को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है।

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए मां ब्रह्मचारिणी ने कठोर तप किया था।

इसी वजह से मां के इस रूप को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है।

ब्रह्मचारिणी का एक अर्थ यह भी होता है।

जो भगवान ब्रह्मा द्वारा बताए गए मार्ग पर चलती हैं। हमेशा संयम और नियम से जीवन जीती हैं।

मां दुर्गा का यह स्वरूप हमें यह प्रेरित करता है कि अगर जीवन में सफलता के शिखर पर पहुंचना है, तो नियम और संयम के साथ आगे बढ़ना बहुत जरूरी है।

ब्रह्मचारिणी की पूजा पराशक्तियों को पाने के उद्देश्य से की जाती है।

कहते हैं कि इनकी पूजा से कई सिद्धियां मिलती हैं।

भगवान शिव को पाने के लिए माता पार्वती ने वर्षों तक कठोर तप किया था।

उनके इसी संयम और नियम को दर्शाता है माता ब्रह्मचारिणी यह रूप।

मां ब्रह्मचारिणी के चेहरे पर सदा तेज रहता है।

बांए हाथ में कमंडल और दाहिने हाथ में माला धारण करती हैं।

इनकी उपासना करने वाले भक्तों को नियम और संयम की प्राप्ति होती है।

चंद्रघंटा देवी

शारदीय नवरात्रि 2023: नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह देवी का तीसरा रूप है।

मां के इस रूप में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियां समाहित होती हैं।

मस्तक पर सुशोभित अर्द्ध चंद्र की वजह से मां चंद्रघंटा कही जाती हैं।

यानी मां के माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा है।

इनके घंटे की आवाज सुनकर सभी नकारात्मक शक्तियां छू-मंतर हो जाती हैं।

मां का यह रंग सोने की तरह चमकता है और वो सिंह पर विराजती हैं।

मां चंद्रघंटा का यह दिव्य स्वरूप भक्तों के लिए बहुत कल्याणकारी माना जाता है।

जीवन में सफलता और शांति बिना मन की संतुष्टि के नहीं मिल सकती है।

और जिसे आत्मसंतुष्टि और शांति चाहिए, उन्हें मां चंद्रघंटा की आराधना करनी चाहिए।

कूष्मांडा माता

शारदीय नवरात्रि 2023: नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा माता की पूजा की जाती है। यह मां दुर्गा का चौथा स्वरूप है।

मां के चेहरे पर हमेशा मंद हंसी खिली रहती है। देवी की मंद मुस्कान की वजह से ब्रह्मांड की रचना हुई थी।

इसी कारण से मां को कूष्मांडा देवी कहा जाता है। मां की पूजा-अर्चना से डर-भय भाग जाता है।

जब चारों ओर घनघोर अंधेरे का वास था, तब मां की ऊर्जा से सृष्टि का सृजन हुआ था।

कहा जाता है कि मां कूष्मांडा अपनी 8 भुजाओं में धनुष, बाण, कमल, अमृत, चक्र, गदा और कमण्डल धारण करती हैं।

मां के आठवें हाथ में हमेशा माला सुशोभित रहती है। मां भक्त को भवसागर से पार उतारती हैं।

जिन्हें भय या डर पर विजय पाना है। सफलता की राह पर निरंतर आगे बढ़ते रहना है।

उन सभी भक्तों को मां कुष्मांडा की पूजा करनी चाहिए।

स्कंदमाता

शारदीय नवरात्रि 2023: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा की स्कंदमाता के रूप में पूजन किया जाता है।

माता अपने इस रूप में अपनी गोद में कुमार कार्तिकेय को लिए हुए हैं।

मां पार्वती कार्तिकेय की मां हैं और कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है।

इसी वजह से इन्हें स्कंद माता बुलाया जाता है। मां कमल के आसन पर विराजती हैं और इनका वाहन सिंह है।

ये शक्ति और सफलता की दाता हैं। इनका रूप ममतामयी और मनमोहक है।

मां अपनी दो भुजाओं में कमल, एक हाथ में वर मुद्रा और एक हाथ से अपनी गोद में स्कंद कुमार को लिए हुए हैं।

स्कंदमाता को सदैव अपने भक्तों के कल्याण के लिए जाना जाता है।

कात्यायनी माता

शारदीय नवरात्रि 2023: नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा की कात्यायनी माता के रूप में पूजा-आराधना की जाती है।

कहते हैं कि देवी दुर्गा को अपनी पुत्री के रूप में पाने के लिए कात्यायन ऋषि ने बहुत घोर तपस्या की थी।

इसीलिए मां कात्यायिनी को ऋषि कात्यायन की पुत्री माना जाता है।

मां कात्यायनी का यह स्वरूप बेहद तेजमय और दिव्य है।

चार भुजाओं वाली यह देवी अपने एक हाथ में अभयु मुद्रा धारण करती हैं।

मां के दूसरे हाथ में वरमुद्रा, तीसरे हाथ में तलवार और चौथे हाथ में कमल सुशोभित है।

सिंह की सवारी करने वाली मां कात्यायनी अच्छे स्वास्थ्य की देवी हैं।

इनके पूजन से रोग, शोक और संताप से मुक्ति मिलती है।

जीवन में कामयाब बनने के लिए अच्छी सेहत का होना बेहद जरूरी है।

इनकी साधना से आलौकिक शक्ति की प्राप्ति होती है।

कालरात्रि माता

शारदीय नवरात्रि 2023: नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा को कालरात्रि माता के रूप में पूजा जाता है।

मां का यह स्वरूप बहुत प्रचंड, लेकिन अधिक शुभ फल देने वाला माना जाता है।

कहते हैं कि रक्तबीज नामक राक्षस का संहार करने के लिए मां ने यह भयानक रूप धारण किया था।

रात के समय मां कालरात्रि ki साधना करने से आलौकिक शक्तियों और तंत्र-मंत्र सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

सभी तरह के भय और पापों से मुक्ति मिलती है। दुश्मनों पर जीत मिलती है और तेज-प्रताप में वृद्धि होती है।

महागौरी माता

शारदीय नवरात्रि 2023: मां भगवती को आठवें स्वरूप में महागौरी के रूप में पूजा जाता है।

यानी दुर्गा अष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा-आराधना की जाती है।

मां महागौरी श्वेत वस्त्र और आभूषण धारण करती हैं। इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है।

देवी का एक हाथ अभय मुद्रा वाली स्थिति में रहता है।

माता एक हाथ में त्रिशूल, एक हाथ में डमरु और एक हाथ में वर मुद्रा धारण करती हैं।

मां महागौरी की पूजा से सभी पापों से छुटकारा मिलता है। जीवन में सुख-शांति आती है।

सिद्धिदात्री माता

शारदीय नवरात्रि 2023: नवरात्रि के नौवें यानी अंतिम दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप का पूजन मां सिद्धिदात्री के रूप में किया जाता है।

मां भगवती के इस स्वरूप को अमोघ सिद्धियां प्रदान करने वाला माना जाता है।

जो भक्त सच्चे तन-मन से देवी की पूजा-अर्चना करता है, उसे सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

कहा जाता है कि मां सिद्धिदात्री ने ही भगवान शिव को सिद्धियां दी थीं।

इसी वजह से भगवान भोलेनाथ अर्द्ध नारीश्वर कहे जाने लगे थे।

मां सिद्धिदात्री का आसन कमल का फूल है और सिंह इनका वाहन है।

इनकी उपासना करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

शारदीय नवरात्रि 2023 में कब है?

Shardiya Navratri 2023: इस बार शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 15 अक्टूबर, 2023 (रविवार) से हो रही है।

जो नौ दिन चलते हुए 23 अक्टूबर, 2023 (सोमवार) को समाप्त हो रही है।

24 अक्टूबर, 2023 (मंगलवार) विजयादशमी या दशहरा का पर्व मनाया जाएगा।

नवरात्रि का पावन त्योहार हर साल अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है।

इस हिसाब से इस साल प्रतिपदा की तिथि 14 अक्टूबर 2023 (शनिवार) की रात 11 बजकर 24 मिनट से शुरू हो रही है।

जो 15 अक्टूबर, 2023 (रविवार) को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो रही है।

उदया तिथि के महत्व के अनुसार नवरात्रि का विश्व विख्यात पर्व 15 अक्टूबर से 23 अक्टूबर तक बड़े धूमधाम से पूरे भारत में मनाया जाएगा।

शारदीय नवरात्रि 2023 के 9 रंग
दिन 115 अक्टूबर, 2023, रविवारनारंगी (ऑरेंज)
दिन 2 16 अक्टूबर 2023, सोमवारसफेद
दिन 3 17 अक्टूबर 2023, मंगलवारलाल
दिन 418 अक्टूबर 2023, बुधवाररॉयल ब्लू
दिन 5 19 अक्टूबर 2023, गुरुवारपीला
दिन 6 20 अक्टूबर 2023, शुक्रवारहरा
दिन 721 अक्टूबर 2023, शनिवारग्रे
दिन 822 अक्टूबर 2023, रविवारबैंगनी (पर्पल)
दिन 923 अक्टूबर 2023, सोमवारपीकॉक ग्रीन

यह भी पढ़ें: https://gyanmanch.in/nageshwar-jyotirlinga

कहानी स्रोत

1 thought on “Shardiya Navratri 2023: नवरात्रि की अनसुनी बातें, जो सब नहीं जानते”

Leave a Comment