Shiv-Sati Story in Hindi: जब ज़िद बनी जुदाई

Shiv-Sati Story In Hindi: ज़िद करनी चाहिए। क्योंकि, ज़िद से कुछ कर गुजरने की ताकत मिलती है। पर ज़िद, हमेशा पॉजिटिव चीज़ों के लिए करनी चाहिए। निगेटिव कार्यों के लिए की जाने वाली ज़िद, कभी-कभी विनाश की वजह बन जाती है।

पढ़िए, ज़िद पर आधारित ‘भगवान महादेव और माता सती’ के जीवन से जुड़ी एक दर्दनाक कहानी ‘जब ज़िद बनी जुदाई‘। एक ऐसी ज़िद की कहानी, जिसने शिव-सती सहित समस्त संसार को कई हज़ार वर्षों के लिए अंधकार में झोंक दिया था।

कैलाश पर्वत पर कैलाशपति

Shiv-Sati Story In Hindi: वैसे तो कैलाश पर्वत का मौसम हर दिन सुहावना रहता है, पर उस दिन की बात निराली थी।

पाताल-लोक, भू-लोक और स्वर्ग-लोक तक उत्सव का वातावरण फैला हुआ था। देवता, ऋषि-मुनि और पृथ्वी के स्थानीय निवासियों की खुशियां अपने चरम पर थीं।

जब समस्त लोक के वासी अपना सर्वोत्तम वस्त्र और आभूषण पहनकर प्रजापति राजा दक्ष द्वारा आयोजित ‘भव्य यज्ञ’ में भाग लेने जा रहे थे।

तब उनके बेटी और दामाद यानी माता सती और भगवान शिव अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत पर बाघाम्बर बिछे एक चबूतरे पर बैठे, एक-दूसरे से वार्तालाप करने में मग्न थे।

वहीं, नंदी जी और अन्य शिवगण अपने प्रभु की सेवा में अलग-अलग कार्यों में व्यस्त थे। इसी दौरान, माता सती ने आकाश में कई विमानों को एक साथ जाते हुए देखा।

दरअसल, देवतागण कैलाश पर्वत के रास्ते (आकाश मार्ग) अपने विमान से ‘कनखल’ जा रहे थे। ‘कनखल’ यानी राजा दक्ष का विशाल साम्राज्य।

जिज्ञासा बनी पहेली

“स्वामी, ये समस्त देवतागण, इतने उत्साह के साथ कहां जा रहे हैं? कहीं निमंत्रण मिला है क्या?”

जब माता सती ने एक के बाद एक विमानों का काफिला देखा, तो उनसे पूछे बिना नहीं रहा गया। उन्होंने भगवान शिव से पूछ लिया।

“आपके पिता अर्थात् हमारे आदरणीय ससुर, प्रजापति राजा दक्ष ने ‘भव्य यज्ञ’ का आयोजन किया है। समस्त देवांगनाएं एवं देवता उसी यज्ञ में सम्मिलित होने जा रहे हैं।”

भगवान भोलेनाथ ने जब माता के प्रश्नों का उत्तर बड़े प्रेम से दिया, तो उनके चेहरे पर मोती जैसी मुस्कान चमक रही थी।

“अरे वाह! यह तो अत्यंत प्रसन्नता की बात है। हमें तुरंत, उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए निकलना चाहिए। नंदी, अन्य समस्त कार्यों को छोड़ दो। हमें शीघ्र ही कनखल हेतु निकलना है।”

देवी सती जब यह बात बड़े उत्साह के साथ कह रही थीं, तो भोलेनाथ भोले की तरह उन्हें देख रहे थे।

“देवी, जिस स्थान से निमंत्रण नहीं आता, वहां बिना बुलाए कभी नहीं जाना चाहिए। ऐसे स्थान पर सम्मान नहीं, अपमान मिलता है। आपके पिता, मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते हैं। अब ऐसे शुभ अवसर पर, वहां जाना बिल्कुल उचित नहीं है।

वह यज्ञ केवल ‘हमें’ अपमानित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है। संबंध में वे भले ही आपके पिता हैं, परंतु विवाह के पश्चात वे आपको अपना शत्रु समझने लगे हैं।”

जब देवी सती तैयार होने के लिए महादेव के बगल से उठीं, तो भोलेनाथ ने उन्हें टोका।

ज़िद की जीत

Shiv-Sati Story In Hindi: महादेव के लाख समझाने के बाद भी माता केवल अपनी ‘ज़िद’ पर अड़ी रहीं। आखिर अंत में, माता सती की ‘ज़िद’ के आगे भगवान शिव को झुकना पड़ा।

वे स्वयं तो ‘ससुराल’ नहीं गए, परंतु एक बेटी को पिता के घर जाने से नहीं रोक पाए। उस दिन एक बेटी की ‘ज़िद’ जीत गई थी और एक पति की हार हुई थी।

माता सती की खुशी के लिए भगवान भोलेनाथ ने उनकी ‘ज़िद’ को प्राथमिकता दी। उनकी ज़िद का सम्मान किया। पिता के घर साथ आने-जाने के लिए अपने गण वीरभद्र को भेज दिया।

उधर देवी सती ने मायका जाने के लिए बड़े उत्साह के साथ कैलाश पर्वत से कदम बाहर रखें। इधर महादेव के नेत्रों से अपने आप मोती की धार निकलने लगी।

अपनी शक्ति को अपने से दूर जाते देखकर, भगवान शिव के हृदय से बार-बार बस यही आवाज़ निकलती रही -“रुक जाओ प्रिय सती, वहां आपको सम्मान नहीं…”

भूल बनी शूल

Shiv-Sati Story In Hindi: भगवान ब्रह्मा जी के पुत्र राजा दक्ष प्रजापति के भव्य यज्ञ महोत्सव में अद्भुत और अलौकिक सम्मानीय अथिति बैठे हुए थे।

त्रिदेव में दो देव यानी भगवान ब्रम्हा और श्री हरि विष्णु अपनी-अपनी अर्धांगिनियों के साथ शांतिपूर्वक बैठे हुए थे। संसार के समस्त देवी-देवताओं के अलावा, उस यज्ञ में दक्ष प्रजापति की समस्त बेटियां व दामाद सम्मिलित थे।

पुजारियों का मंत्रोच्चार पूरे आकाशमंडल में गूंज रहा था। शंखनाद के साथ डमरू धुन, नगरवासियों में नई ऊर्जा का संचार कर रहा था।

भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से चमकती छवि, उस समारोह की शोभा में नई जान भर रही थी।

ऐसे में दरबारियों से लड़-झगड़कर, सितारों की जगमगाती दुनिया में देवी सती का आगमन हुआ। माता के शरीर पर वस्त्र के नाम पर केवल बाघाम्बर थे।

पर, पिता के शुभ कार्यों में शामिल होने और वर्षों बाद बहनों से मिलने की खुशी अद्भुत थी। इसी खुशी में देवी यह भी भूल गई थीं कि वे बाघाम्बर रूप में राजा दक्ष के आलीशान समारोह शामिल हो गई थीं।

भरी सभा में देवों के देव का अपमान

देवी सती को बाघाम्बर रूप में देखते ही राजा दक्ष का क्रोध यज्ञ की दहकती ज्वाला से भी तेज दहकने लगा। “बाघाम्बर जैसा स्वरूप बनाकर, क्या मेरा अपमान करने आई हो?”

दक्ष के स्वर में क्रोध के साथ-साथ चुल्लू-भर पानी में डूब मरने वाला व्यंग्य था।

“तुम्हारा पति, श्मशान-वासी है। भूतों का नायक है! जो स्वयं बाघाम्बर पहनता है; भस्म का श्रृंगार करता है; उसकी पत्नी से और क्या आशा की जा सकती है।”

पिता के मुंह से ऐसे कटु वचन सुनकर देवी सती पश्चाताप के वियोग में डूब गई। महादेव द्वारा कहे गए हर शब्द कान में गूंजने लगे। सोचने की क्षमता शून्य हो गई। पिता-पुत्री का रिश्ता खंड-खंड हो गया।

मायका का गुमान टूट गया। बचपन की सुनहरी यादें, काली हो गईं। कुछ नहीं बचा। एक ‘ज़िद’ ने मिनटों में सबकुछ बर्बाद कर दिया।

कदम न पिता की तरफ जा रहे थे, न ही कैलाश की तरफ मुड़ पा रहे थे। गर्मी के तालाब के पानी की तरह कदम ठहर गए थे।

माता सती को भगवान शंकर द्वारा कही गई वह बात बार-बार कानों में गूंजने लगी कि “बिना बुलाए, कभी किसी के घर नहीं जाना चाहिए। चाहे वह स्वयं के पिता का ही घर क्यों न हो।”

पश्चाताप के शोक में डूबी देवी सती अब कर ही क्या सकती थीं। अब तो उनके चरण-कमल राजा दक्ष के आलीशान यज्ञ में पड़ ही चुके थे और अपमान की जलधारा पी चुकी थीं।

चिंगारी बनी ज्वाला

Shiv-Sati Story In Hindi: पिता के कटु बचन सुनकर भी देवी शांत रहीं। उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। बस यज्ञ की ओर बढ़ती गईं।

जब यज्ञ-मंडप में पहुंचीं, तो सभी देवताओं के ‘यज्ञ भाग’ दिखे; लेकिन, भगवान शिव का ‘यज्ञ भाग’ न दिखने की वजह से ज़्यादा परेशान हो गईं।

उन्होंने पिता दक्ष से अपनत्व वाले स्वर में पूछा – “पिता जी, इस यज्ञ-मंडप में समस्त देवताओं के भाग दिखाई दे रहे हैं, किंतु कैलाशपति महादेव का भाग कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।”

बेटी के इस प्रश्न पर पिता ने अहंकार वाले स्वर में दहाड़ते हुए कहा – “मैं, तुम्हारे पति को देवता नहीं, भूतों का स्वामी समझता हूं।

अर्धनग्न रहने एवं हड्डियों की माला धारण करने वाले अघोड़ी हेतु इस यज्ञ में कोई स्थान नहीं। मेरी दृष्टि में वह देवताओं की सभा में बैठने योग्य नहीं है। उसकी गरिमामयी उपस्थिति, केवल भूतों की सभा में शोभा देती है।”

स्त्री स्वयं का अपमान हंसते-हंसते सह सकती है, परंतु भरी सभा में पति का अपमान कभी नहीं सह सकती है। चाहे अपमान करने वाला स्वयं उसका पिता ही क्यों न हो!

पति के विषय में पिता द्वारा कहे गए कटु वचन के बाण देवी सती के ह्रदय को भेदते हुए निकल गए। कोमल हृदय से अब चिंगारी निकलने लगी थी।

क्रोध की उस अग्नि में एक विनाश-ज्वाला ने जन्म ले लिया था। एक ऐसी ज्वाला, जो समस्त सृष्टि का सर्वनाश कर सकती थी।

सबसे पहले, देवी सती ने अपने दहकते नेत्रों से सभा में उपस्थित सभी देवताओं और सम्मानित अतिथियों को देवों के देव महादेव के अपमान पर मौन देखा।

माता सती हुईं सती

Shiv-Sati Story In Hindi: महादेव के अपमान पर, सभा में उपस्थित सभी प्रतापी राजाओं और देवों आदि के सिर शर्म और बेबसी से झुके हुए थे।

सबके सब उत्तर देने में असमर्थ दिखाई दे रहे थे। देवी सती ने स्वयं के साथ-साथ सभा में उपस्थित सभी लोगों को धिक्कारा।

“मुझे गर्व है कि, देवों के देव महादेव मेरे पति, मेरे स्वामी हैं। पृथ्वी, आकाश, चंद्रमा सहित, इस संसार में जितने भी देवतागण हैं, सब मेरे कैलाशपति के सेवक हैं।”

अपने अहंकारी पिता के अहंकार का उत्तर, माता सती ने सिंह की तरह दहाड़ते हुए दिया।

“स्वयं भगवान ब्रम्हा, जिनके दिन-रात गुणगान करते हैं, वो हैं मेरे भोलेनाथ। स्वयं भगवान विष्णु, जिनका प्रत्येक क्षण जाप करते हैं, वो हैं मेरे महादेव।

जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि का विनाश करने की शक्ति रखते हैं, वो सर्वशक्तिमान हैं मेरे प्रभु।

आपने मेरा अपमान किया, मैंने हंसते-हंसते स्वीकार कर लिया। परंतु, मेरे परमेश्वर का अपमान, मैं कदापि सहन नहीं करूंगी।

मेरा यह मिट्टी का शरीर, आपकी देन है। इसलिए मैं आज, इस भरी सभा में भगवान ब्रम्हा-विष्णू को साक्षी मानकर, अपने इस शरीर को इस पवित्र अग्नि-कुंड में समर्पित कर, आपसे सदा-सदा के लिए संबंध समाप्त कर रही हूं।”

इतना कहकर देवी सती भगवान शिव के अपमान के उद्देश्य से किए जा रहे उस यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देकर, सदैव के लिए अपने पिता दक्ष प्रजापति से रिश्ता तोड़ लिया।

कहानी पुरानी, सीख अनोखी

एक ‘ज़िद’ की वजह से देवी सती तो सती हो गईं, परंतु महादेव की समस्त खुशियों और सपनों को कई हजार वर्षों के लिए तोड़ गईं। माता सती के बिना भगवान शिव शव (लाश) के समान हो गए।

माता के सती होने के बाद, भगवान शिव 60 हजार वर्षों तक के लिए समाधि में चले गए। इस तरह, एक गलत ‘ज़िद’ की वजह से ‘सती-शिव’ 87 हजार वर्षों तक एक-दूसरे के वियोग में जलते रहे थे।

एक गलत ‘ज़िद’ की वजह से दो जीवन, कई घर-परिवार और समस्त संसार सदा के लिए अंधेरे में खो गए।

आप ‘ज़िद’ कीजिए, मगर अच्छे कार्यों के लिए। अच्छे उद्देश्यों और अपनी सफलता के लिए।

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