Vajreshwari Temple Vasai-Virar: ऐतिहासिक स्थान, आदिशक्ति विराजमान

Vajreshwari Temple Vasai-Virar History, Yogini Devi Story, Hot Water Kund, Location & Hotel in Hindi: श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर महाराष्ट्र का एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। इस पौराणिक टेंपल की गाथा पालघर, ठाणे, मुंबई और नवी मुंबई तक फैली हुई है। इसके अलावा श्री वज्रेश्वरी धाम, गर्म पानी कुंड, झरना, नदी, पहाड़, शांति, प्राकृतिक सुंदरता, बेहतर मेहमाननवाजी और वन डे-टू डे पिकनिक के लिए जाना जाता है।

Vajreshwari Temple Vasai-Virar in Hindi: श्री वज्रेश्वरी योगिनी माता के चरणों में समर्पित इस आर्टिकल में आप जानेंगे श्री वज्रेश्वरी देवी के अवतार की कथा।

किसने कराया था इस भव्य और किला आधारित मंदिर का निर्माण?

यह प्राचीन मंदिर कहां स्थित है और पता क्या है?

क्यों यह मंदिर भक्तों और पर्यटकों के बीच इतना फेमस है?

वज्रेश्वरी में होटल कहां लें और किराया कितना है?

वज्रेश्वरी में गर्म जल कुंड कहां है?

गर्मी के मौसम में नदी के किनारे देसी खाट का आनंद कैसे उठाएं?

सिर्फ़ इतना ही नहीं, इस आर्टिकल में आप वज्रेश्वरी के बारे वह सब जानेंगे, जो सभी नहीं जानते या नहीं बताते हैं।

सबसे पहले हम वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर का रोचक इतिहास जानेंगे।

Vajreshwari Temple Vasai-Virar in Hindi

वज्रेश्वरी सिर्फ़ महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि भारतवर्ष का एक ऐसा स्थान है, जहां इतिहास आज भी वर्तमान है।

इतिहास के सुनहरे पन्ने पलटकर देखने पर पता चलता है कि वज्रेश्वरी का महत्त्व कितना बड़ा है।

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर की गाथा भक्ति और साहस के अनोखे संगम से सुसज्जित है।

मंदिर के मुख्य द्वार की दीवारों पर काले संगमरमर के दो नोटिस स्टोन स्थापित किए गए हैं।

दोनों पत्थर मंदिर की दायीं और बायीं दीवार पर सुसज्जित हैं।

एक दीवार पर श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर का गौरवशाली इतिहास और दूसरी दीवार पर देवी के अवतार की अद्भुत गाथा सुनहरे अक्षरों में अंकित है।

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उस पत्थर पर मराठी भाषा में दर्ज जानकारी के अनुसार, वह युग पेशवाओं का था।

लेकिन, मुंबई से लेकर दमन तक पुर्तगालियों का शासन फैला हुआ था।

हत्या, छिनौती, अपहरण, बलात्कार, आदि हर तरफ फल-फूल रहा था।

जनता त्रस्त थी, पुर्तगाली अधिकारी भ्रष्ट और सैनिक मस्त थे।

बहन, बेटियों और माताओं का घर से निकलना मुश्किल था।

अपने ही देश और गांव में खुलकर सांस लेने की आज़ादी नहीं थी।

पूजा-पाठ और त्योहार मनाना मना था। नज़रें उठाकर चलने की इजाजत नहीं थी।

अपने ही घर में कैदी बनकर जीवन जी रहे थे लोग।

जो लोग पुर्तगालियों के इस नियम को तोड़ते, उन्हें कठोर दंड और यातनाएं सहनी पड़ती।

Vajreshwari Temple History in Hindi

वह भयभीत कर देने वाला दौर था, जब महाराष्ट्र का प्राचीन वसई किला पुर्तगालियों के कब्ज़े में था।

पुर्तगाली सिपाही उसी किले के जरिए मुंबई से लेकर दमन तक विनाश और अपराध का खूनी खेल खेल रहे थे।

अपराध और अहंकार की सीमा चाहे जितनी बड़ी हो, सही समय के साथ एक दिन सिमट ज़रूर जाती है।

फिर एक दिन असहाय जनता की दर्दभरी पीड़ा पेशवाओं के कानों में पड़ी।

श्रीमंत चिमाजी अप्पा साहेब पेशवा ने वसई किला पर चढ़ाई करने का फैसला लिया।

और, अपने दिलेर एवं जाबाज़ सिपाहियों के साथ मुहिम पर निकल पड़े।

वज्रेश्वरी से वसई फोर्ट की दूरी लगभग 40-42 किमी है।

काफिला पुणे से निकला था और वज्रेश्वरी गांव में विश्राम कर रहा था।

वसई किला फतेह करने से पहले श्रीमंत चिमाजी अप्पा साहेब पेशवा ने माता वज्रेश्वरी देवी का विधिवत पूजन और हवन किया।

उस दौरान उन्होंने माता वज्रेश्वरी से आशीर्वाद मांगते हुए कहा कि “हे मां! यदि मैं अपने लक्ष्य को पाने में सफल हुआ, तो आपका किले की तरह भव्य मंदिर बनवाऊंगा।”

उनकी पूजा और भक्ति से माता प्रसन्न हुईं और स्वप्न में उन्हें किला जीतने का तरीका बताया।

माता रानी की कृपा से श्रीमंत चिमाजी वसई फोर्ट जीतने में सफल हुए।

वसई किला पर भगवा ध्वज लहराने लगा। मराठों की इस ऐतिहासिक जीत ने नया इतिहास रच दिया था।

श्रीमंत चिमाजी अप्पा साहेब पेशवा के नेतृत्व में लड़ा गया वह युद्ध सदा-सदा के लिए अमर हो गया।

महाराष्ट्र की आन, बान और शान वसई किला आज भी अपने स्वर्णिम इतिहास की गवाही दे रहा है।

जो वादा किया, वो निभाया!

Vajreshwari Temple Vasai-Virar History: 1738 में वसई किला पर विजय पताका लहराने के बाद दुखी प्रजा सुखी हो गई।

श्रीमंत चिमाजी अप्पा साहेब पेशवा ने माता वज्रेश्वरी देवी से कहा था कि “किले जैसा भव्य मंदिर बनवाऊंगा।”

उसी साल माता का किलेनुमा मंदिर बनवाकर उन्होंने अपने वादे को पूरा किया।

आपको बता दें कि इस दिव्य और भव्य मंदिर के निर्माण से पहले उन्होंने वसई किले के पास देवी का छोटा मंदिर बनवाया था।

वह प्राचीन मंदिर आज भी वसई किले के पास देखा जा सकता है।

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर के निर्माण का वर्ष 1738-39 माना जाता है।

मंदिर के मुख्य द्वार पर श्रीमंत चिमाजी अप्पा साहेब पेशवा की वीरता की गाथा सुनहरे अक्षरों में अंकित है।

यह विशाल मंदिर एक पहाड़ के टीले पर स्थित है।

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सड़क से मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल 52 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

सीढ़ियां काफी लंबी-चौड़ी हैं।

सीढ़ियों के बीचों-बीच सुनहरे रंग के कछुए की प्रतिमा स्थापित है।

कैसा है मंदिर का स्वरूप?

Vajreshwari Temple Vasai-Virar History: श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर की बनावट बाहर से देखने पर लगता है कि जैसे राजा-महाराजा का कोई किला या महल है।

मंदिर का गेट बेहद भव्य और किले की तरह है।

दीवारें काले मोटे पत्थरों की हैं।

मंदिर के ऊपरी बाहरी हिस्से पर अलंकृत शेर और शेषनाग की नक्काशी बेहद बेजोड़ है।

डिज़ाइन में प्राचीन और आधुनिक झलक दिखाई देती है।

मंदिर का अग्रभाग यानी गलियारा बेहद सुंदर है, जिसमें कई खंभे हैं।

गलियारे की फर्श सफेद संगमरमर की है, जो आइने की तरह चमकती रहती है।

दो फ्लोर वाले इस गलियारे की दीवारों और खंभों को सफेद एवं सुनहरे रंग में रंगा गया है।

भक्तों की सुविधा के लिए थोड़े-थोड़े अंतराल पर सीलिंग फैन की व्यवस्था है।

गर्भगृह में कौन-कौन हैं विराजमान?

Vajreshwari Temple Vasai-Virar History: मंदिर के गर्भगृह में श्री वज्रेश्वरी देवी की मूर्ति के साथ-साथ श्री रेणुका देवी और श्री कालिका देवी की खूबसूरत प्रतिमाएं स्थापित हैं।

सबसे बीच में माता वज्रेश्वरी योगिनी देवी, उनकी दायीं तरफ माता रेणुका देवी और बायीं ओर माता कालिका देवी विराजित हैं।

श्री रेणुका देवी की मूर्ति के बगल में श्री महालक्ष्मी माता की खूबसूरत प्रतिमा और उनके बगल में बाघ की मूर्ति स्थापित है।

उसी तरह श्री कलिका देवी के बगल में काले पत्थर में श्री परशुराम भगवान की मूर्ति मौजूद है।

श्री परशुराम भगवान श्री हरि विष्णु के 6वें अवतार हैं और उनकी माता का नाम श्री रेणुका देवी है।

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी भारत का एक ऐसा मंदिर है, जहां श्री परशुराम भगवान अपनी माता श्री रेणुका देवी के साथ निवास करते हैं।

तीनों देवियों के दाहिने हाथ में तलवारें और सिर पर चांदी के मुकुट सुशोभित हैं।

चारों माताओं की छवि बेहद सुंदर और मनमोहक है।

मंदिर प्रांगण में कई मंदिर

Vajreshwari Temple Vasai-Virar in Hindi: माता रानी की सेवा में पुजारी के साथ-साथ सुरक्षाकर्मी हर समय मौजूद रहते हैं।

गर्भगृह में फोटो खींचने पर सख्त मनाई है। पकड़े जाने पर तुरंत दंडात्मक कार्यवाही की जाती है।

मंदिर परिसर में और कई देवताओं के मंदिर मौजूद हैं।

इन मंदिरों में सबसे ज़्यादा देवों के देव महादेव के मंदिर हैं।

एक लाइन से भगवान भोलेनाथ के तीन शिवलिंग सफेद संगमरमर में स्थापित हैं।

एक शिवलिंग और नंदी जी खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं।

वहीं एक मंदिर के भीतर भगवान भोलेनाथ की तांबे की प्रतिमा सुशोभित है।

लंबी मूंछों में महादेव का हंसता मुखड़ा और गले में नाग-माला देखकर सुकून मिलता है।     

भगवान श्री गणेश जी के साथ-साथ यहां भगवान हनुमान जी और श्री दत्त भगवान का मंदिर मौजूद है।

मंदिर के पीछे कुछ दूरी पर गोसाईं सम्प्रदाय के कुछ संतों की समाधियां हैं।

भक्तों के लिए मौजूद सुविधाएं

भक्ति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए मंदिर परिसर में श्री योगिनी रंगमंच की सुविधा उपलब्ध है।

यह रंगमंच बेलों की छाया से सुसज्जित है।

रंगमंच पर समय-समय पर नृत्य नाटिकाएं, नाटक, गायन, प्रवचन आदि का कार्यक्रम होता रहता है।

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इसके अलावा मंदिर के पीछे वाले हिस्से यानी पहाड़ी पर हवन यज्ञ की सुविधा उपलब्ध है।

चारों तरफ साफ-सुथरा प्रांगण हरियाली की चादर से घिरा हुआ है।

परिसर के भीतर एक विशाल पेड़ कई सालों से सिर उठाए खड़ा है।

पेड़ की सुरक्षा और पूजा के लिए उस पर चबूतरा बना हुआ है।

परिसर के भीतर 50 रुपए में लड्डू प्रसाद, 200 रुपए में माता रानी की तस्वीर और पूजा संबंधित अन्य सामग्री आसानी से मिल जाती है।

प्रसाद, फूल-माला, साड़ी, नारियल, आदि की खरीदारी मंदिर के बाहर से भी की जा सकती है।

अधिकांश माता भक्त अपनी गाड़ी मंदिर के सामने वाली दुकानों पर फ्री में पार्क करते हैं।

बदले में फूल-माला और प्रसाद आदि की खरीदारी करते हैं।

खरीदारी के लिए दुकानदार किसी तरह की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करते हैं।

आप अपनी स्वेच्छा से जो चाहें, जितना चाहें खरीद सकते हैं।

यात्रियों के लिए प्रांगण के बाहरी हिस्से यानी पहाड़ी वाले सिरे पर शौचालय की सुविधा मौजूद है।

देवी के अवतार की कहानी (Vajreshwari Yogini Devi Story)

सबसे पहले आपको बता दें कि श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मां स्वयंभू हैं!

स्वयंभू का अर्थ यह हुआ कि देवी ने स्वयं अवतार लिया था।

यानी देवी मां स्वयं इस स्थान पर कई युगों से विराजमान हैं।

अनंत काल पहले कलिकाल और सिंहमार नामक दो निर्दयी राक्षस हुआ करते थे।

उनके प्रकोप और अत्याचार से ऋषि-मुनि ही नहीं, बल्कि सभी देवता भी परेशान थे।

असुरों से अपने प्राणों की रक्षा के लिए एक दिन सभी ऋषि-मुनि और देवता महर्षि वशिष्ठ के शरण में गए।

पीड़ितों की पुकार सुनने के बाद ऋषि ने माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए त्रिचंडी यज्ञ का आयोजन किया।

ऋषि-मुनियों के यज्ञ से मां आदिशक्ति बहुत प्रसन्न हुईं।

लेकिन, यज्ञ के दौरान देवताओं के राजा इंद्र को आहुति ना मिलने की वजह से वे काफी नाराज और क्रोधित हुए।

अपना वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य से इंद्रदेव ने अपने ‘वज्र’ से महर्षि वशिष्ठ और यज्ञ में शामिल सभी साधु-संतों पर प्रहार कर दिया।

वज्र को अपने पास आते देख सभी ऋषि-मुनि भयभीत हो उठे।

उन्होंने अंदाजा लगा लिया कि इस विनाशकारी अस्त्र से हमारे साथ-साथ पृथ्वी के अन्य जीवों को भारी नुकसान होगा।

इससे संसार में भयंकर प्रलय आ जाएगी।

यही सोचकर सभी ऋषि-मुनि महर्षि वशिष्ठ के साथ आदिशक्ति मां पार्वती की स्तुति करने लगे।

मां ममता और दया की सागर हैं। अपने संतानों की पुकार सुनकर तुरंत दौड़ी चली आईं।

मां आदिशक्ति का साक्षात् निवास

जिस अस्त्र को राजा इंद्रदेव ने ऋषि वशिष्ठ पर चलाया था, उसे देवी मां ने अपने ऊपर ले लिया।

इस तरह मुनियों की जान बची और युद्ध समाप्त हुआ।

कहा जाता है कि उस दौरान भगवान श्री राम भी उपस्थित थे।

उन्होंने देवी मां से कहा कि “आपका अवतार संसारवासियों के कल्याण हेतु हुआ है।

अतः हे देवी! आप सदा इस स्थान पर भक्तों के संकट मिटाने के लिए निवास करें।

आप जिस स्वरूप में हैं, उसी रूप में यहां वास करें।

आपने इंद्रदेव का वज्र अपने ऊपर लेकर तथा कलिकाल एवं सिंहमार जैसे शक्तिशाली असुरों की लीला समाप्त करके, संसार को भयंकर प्रलय से बचाया है।

हे देवी! हमारी आपसे यही विनती है कि आज से आप इस पवित्र स्थल पर ‘वज्रेश्वरी देवी’ के नाम से सदा निवास करें और आपकी चौखट पर आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती रहें।”

माना जाता है कि तब से देवी पार्वती यानी आदिशक्ति माता वज्रेश्वरी के नाम से इस मंदिर में साक्षात् निवास करती हैं।

वज्रेश्वरी क्यों प्रसिद्ध है?

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महाराष्ट्र की पावन भूमि पर स्थित वज्रेश्वरी का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व है।

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर की बनावट में सनातन धर्म का गौरव दिखता है।

मंदिर में प्रवेश करते ही मन को जो सुकून मिलता है, उसे शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता है।

मां वज्रेश्वरी देवी साक्षात् आदिशक्ति हैं। जिनके दर्शन मात्र से भक्तों के सभी पाप मिट जाते हैं।

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कहते हैं कि जो भक्त सच्चे भाव से देवी के पूजन-दर्शन करते हैं। मां उनकी मुरादें अवश्य पूरी करती हैं।

यही कारण है कि मां के दरबार में बड़ी दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

महाराष्ट्र के अलावा यहां गुजरात के पर्यटक भारी संख्या में आते हैं।

नवरात्रि के अवसर पर सुबह से शाम तक भीड़ उमड़ी रहती है।

हर रविवार या अन्य छुट्टी के दिन हजारों की संख्या वाली कतार हर पल दिखाई देती है।

मंदिर कब खुलता और बंद होता है?

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मंदिर खुलने व देवी की प्रथम पूजा-आरती का समय – प्रातः 5.30 बजे।

देवी मां की मध्यान्ह आरती – सुबह 11.15 बजे।

नैवेद्य पूजा का समय – सुबह 11.30 बजे से दोपहर 2.00 बजे तक।

मां देवी की पाद्य पूजा का समय – शाम 7 बजे।

रात्रि की आरती का समय –  8.15 बजे।

देवी की शेजारती और मंदिर बंद होने का समय – रात्रि 9 बजे।

सूचना: उत्सव और कार्यक्रम के दौरान समय आदि में बदलाव हो सकता है।

माता वज्रेश्वरी देवी का साड़ी श्रृंगार बहुत प्रसिद्ध है। साड़ी मंदिर प्रांगण के भीतर मिल जाती है।

मंदिर से खूबसूरत दिखता है शहर का नज़ारा

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मुंबई में रहते हैं और वज्रेश्वरी नहीं देखा, मतलब आपने मुंबई का एक अलग पहलू नहीं देखा।

मंदारगिरी पर्वत के सुरम्य वादियों में बसा श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर आकर्षण का केंद्र है।

मंदिर के प्रांगण से वज्रेश्वरी शहर का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है।

जिस तरफ नज़र पड़ती है, मनमोहक दृश्य दिखाई देते हैं।

ऊंचे-नीचे पर्वत और हरे-भरे पेड़ आंखों को ठंडक देते हैं।

मंदिर की दाहिनी तरफ तानसा नदी बहती, गुनगुनाती और कई किस्से सुनाते दिखाई देती है।

मंदिर प्रांगण की बायीं तरफ सिर फैलाए पहाड़ खड़ा है। जिसके शिखर पर एक मंदिर है।

वह छोटा मंदिर श्री ॐ चैतन्य महंत गोधडेबाबा महाराज की समाधि है।

युवा भक्त्त दौड़ते हुए पहाड़ के शिखर पर विराजमान मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।

उसके बाद लोग खूबसूरत और भव्य प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच वीडियो आदि बनाते हुए अपनी क्रिएटिविटी को नई ऊंचाई देते हैं।

समाधि मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं।

ऊपर पहुंचने के बाद चारों ओर प्रकृति का अद्भुत रूप और शहर का अलग रंग दिखाई देता है।

Vajreshwari Temple Location & Hotel

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर ‘विरार-वज्रेश्वरी और अंबाडी-भिवंडी-कल्याण रोड’ पर ‘वज्रेश्वरी’ शहर में मौजूद है।

वज्रेश्वरी शहर तानसा नदी के तट पर तालुका भिवंडी, जिला ठाणे, महाराष्ट्र, भारत में स्थित है।

जिसका पिन कोड-401204 है। यही इसका आधिकारिक पता है।

पश्चिम रेलवे लाइन के विरार रेलवे स्टेशन से वज्रेश्वरी की दूरी लगभग 30 किमी है।

विरार से वज्रेश्वरी के लिए समय-समय पर बस और ऑटो की सेवाएं मौजूद हैं।

आप ओला, ऊबर और रैपिडो के जरिए भी कार, रिक्शा और बाइक बुक कर सकते हैं।

विरार का बस स्टेशन विरार पश्चिम में 2-3 मिनट के वॉकिंग डिस्टेंस पर है।

बस के लिए विरार पश्चिम (वेस्ट) में आएं और टैक्सी-ऑटो के लिए विरार पूर्व (ईस्ट) में जाएं।

वसई रेलवे स्टेशन से भी वज्रेश्वरी के लिए बस और ऑटो की सुविधाएं मौजूद हैं।

लेकिन, वहां से वज्रेश्वरी की दूरी लगभग 45 किमी पड़ जाती है, जिसका असर आपके समय और लागत पर पड़ता है।

वज्रेश्वरी बड़े आराम से पहुंचने के लिए सबसे आसान ऑप्शन है विरार।

खडवली या खडावली रेलवे स्टेशन से श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर लगभग 31-35 किमी दूर है।

यह स्टेशन मध्य रेल लाइन के तहत आता है।

वज्रेश्वरी में होटल कहां ले?

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श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर के अलावा यह स्थल पिकनिक स्पॉट के लिए बेहद प्रसिद्ध है।

वीकेंड पर यहां सैलानियों की भीड़ देखी जा सकती है।

पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर्याप्त संख्या में होटल और रेस्टोरेंट उपलब्ध हैं।

यहां होटल काफी किफायती और वाजिब दाम में मिल जाते हैं।

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर से अकलोली वाली सड़क तानसा नदी के साथ लगभग 1 किमी तक चलती है।

उस दौरान पूरे रास्ते होटल ही होटल दिखाई देते हैं।

ज़्यादा होटल नदी के किनारे या सामने हैं।

नदी के एक किनारे सड़क और उसके दोनों तरफ होटल्स हैं और नदी की दूसरी तरफ हरियाली ही हरियाली है।

अक्सर आते-जाते समय नदी में नहाने वालों का समूह दिख जाता है।

मुंबई, वसई-विरार, भिवंडी और ठाणे आदि के लोग वीकेंड पर यहां भारी संख्या में आते हैं।

नदी में नहाने और क्रिकेट खेलने के अलावा लोग रात के वक़्त पार्टी का आनंद भी उठाते हैं।

शनिवार और रविवार के दिन ऑफिस ग्रुप के अलावा फेमिली ट्रिप भी देखी जा सकती है।

वज्रेश्वरी में घंटे के हिसाब से भी होटल मिल जाता है।

Vajreshwari Hot Water Kund

वज्रेश्वरी के अकलोली में गर्म पानी का कुंड बहुत ज़्यादा फेमस है।

तानसा नदी के तट पर मौजूद गर्म पानी के कुंडों में डुबकी लगाने के लिए बहुत दूर-दूर से लोग आते हैं।

सभी कुंड पक्के हैं। ज़्यादा उपयोग या भीड़ की वजह से पानी थोड़ा गंदा दिखाई देता है।

मान्यता है कि जो इस कुंड में स्नान करता है, उसे चर्म रोग से राहत मिल जाती है।

कहते हैं कि इन कुंडों के गर्म पानी में कई प्रकार के औषधीय गुण पाए जाते हैं।

कुछ लोग इन कुंडों के जल का उपयोग पूजा और अनुष्ठान आदि के लिए भी करते हैं।

छुट्टी के दिनों में गर्म कुंडों के पास अच्छी-खासी भीड़ जमा हो जाती है।

कुंडों के पानी बेहद गर्म होते हैं।

बहुत से लोग स्नान करते हैं और बहुत से लोग हाथ-पैर धोते हैं।

गर्मी के समय में कुंडों के आसपास का इलाका पिकनिक स्पॉट में बदल जाता है।

अगर देखा जाए तो इन गर्म कुंडों को तानसा नदी के तट पर बनाया गया है।

देखकर लगता है कि जैसे नदी का पानी ही कुंडों में जा रहा है।

नदी का पानी ठंडी में बेहद ठंड और गर्मी में नॉर्मल ठंड रहता है।

लेकिन, कुंडों के पानी बारहों महीने गर्म रहते हैं।

गर्मी भगाओ, चिल हो जाओ

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गर्मी के दिन कुंड के पास का पूरा इलाका बड़े-बड़े और रंगीन साड़ियों वाले तंबुओं से ढक उठता है।

वहां के स्थानीय दुकानदार नदी के तट पर तंबुओं का महल बना देते हैं।

जिसकी छाया में पर्यटक खाट पर बैठकर नदी और पहाड़ का नज़ारा देखते हैं।

उस आशियाने के नीचे आप अपनी बाइक या कार आदि पार्क कर सकते हैं।

इसके लिए पर्यटकों को कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है।

पर हां, उनकी दुकान से कुछ लेकर खाना-पीना जरूर पड़ता है।

बाहर से आने वाले पर्यटकों को नदी में डुबकी लगाते देखा जा सकता है।

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आपको बता दें कि साड़ियों का इस्तेमाल तंबू के रूप में केवल सिर ढकने के लिए किया गया है।

बाकी चारों तरफ का हिस्सा खुला हुआ है।

नदी के किनारे, खाट पर बैठकर, ठंडी हवाओं का लुफ्त और गन्ना रस का स्वाद, गजब का अनुभव देता है।

उसी जगह से बैठे-बैठे प्रति शिर्डी साईबाबा मंदिर, फेलठण का दर्शन होता रहता है।

नदी के इस पार गर्म पानी का कुंड है और नदी के उस पार यह मंदिर है।

इसी तरह गर्म पानी के कुंड गणेशपुरी के आसपास भी हैं।

जानकारों का कहना है कि वह गर्म पानी धरती की सतह को तोड़कर ज्वालामुखी से पिघले हुए मैग्मा से बनकर निकलता है।

तानसा नदी के किनारे बसा वज्रेश्वरी पर्यटकों को अनगिनत सरप्राइज देने की काबिलियत रखता है।

वज्रेश्वरी में क्या-क्या देखें?

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1. श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर, वज्रेश्वरी

2. बुद्धदेव महाराज आश्रम अन्नक्षेत्र, वज्रेश्वरी (वज्रेश्वरी मंदिर से दूरी 1 किमी)  

3. नित्यानंद महाराज समाधि मंदिर, गणेशपुरी (वज्रेश्वरी मंदिर से दूरी 2 किमी वसई-विरार की तरफ)

4. गर्म पानी कुंड, तानसा नदी और प्राचीन शंकर मंदिर, अकलोली (वज्रेश्वरी मंदिर से दूरी 1 किमी)

5. प्रति शिर्डी साईबाबा मंदिर, फेलठण, (गर्म पानी कुंड, अकलोली के ठीक सामने)

6. श्री वज्रेश्वरी देवी मूलस्थान, गुंज-फाटई   

वज्रेश्वरी क्यों जाते हैं लोग?

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पर्यटक के नज़रिए से देखा जाए तो वज्रेश्वरी मन की शांति और रोमांच के लिए सबसे परफेक्ट प्लेस है।

यहां पहुंचने के लिए ना ज़्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं और ना ही समय।

मुंबई, ठाणे और पालघर जिले के नजदीक होने के कारण शनिवार और रविवार के दिन लोग अपनी फेमिली या दोस्तों के साथ छुट्टी बिताने आते हैं।

क्योंकि, यहां गाड़ियों के शोर नहीं, पक्षियों के गीत सुनाई देते हैं।

शहर की ऊंची-ऊंची इमारतें नहीं, पर्वतों के ऊंचे-ऊंचे और हरे-भरे सिर दिखाई देते हैं।

एसी (AC) वाली महंगी हवाएं नहीं, फ्री में असली शुद्ध हवाओं के गुनगुनाते झोंके मिलते हैं।

भक्तों को मां देवी का आशीर्वाद और पर्यटकों को अपनेपन वाली अनुभूति मिलती है।

प्रकृति के खूबसूरत नज़ारे देखने के अलावा लोग गर्म पानी के कुंड देखने आते हैं, जो कि नेचुरल है।

खाने में आपको महाराष्ट्रीयन फूड के अलावा अन्य देसी-विदेशी डिश मिल जाएंगे।

वज्रेश्वरी में आप दो दिन बड़े आराम और मजे से अपनी फेमिली या दोस्तों के साथ निकाल सकते हैं।

मंदिर के अलावा पिकनिक के लिए भी फेमस है वज्रेश्वरी।

विरार से वज्रेश्वरी जाते समय का नज़ारा बेहद खूबसूरत होता है।

दोनों तरफ हरे-भरे पहाड़ और बीच में हरी-भरी सड़क दिखाई देती है।

इस रास्ते पर आपको कई गांव और थोड़ी-थोड़ी दूर पर रिसोर्ट आदि दिखाई देते हैं।

इस स्थान की महिमा महाराष्ट्र के अलावा गुजरात तक प्रसिद्ध है।

श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर के बारे में विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार नवरात्रि एवं अन्य पर्व बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं।

तश्वीरें यहां देखें: वज्रेश्वरी

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