Virar Mahalaxmi Mandir | दर्शन करो, समृद्धि पाओ

जानिए Virar के सुप्रसिद्ध Hedavde Mahalaxmi Mandir (Temple) की अनोखी Story, Address और Timings सहित अन्य कई महत्वपूर्ण जानकारी आसान हिंदी में।

युगों-युगों से भारत का महाराष्ट्र ऋषियों-मुनियों, साधु-संतों, देवी-देवताओं, वीरों और ज्ञानियों की पावन भूमि रही है। यहां कई ऐसे ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर हैं, जहां स्वयं देवी-देवता निवास करते हैं।

उन्हीं जीवंत मंदिरों में से एक मंदिर है, ‘ॐ श्री 879 हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर’, जो महाराष्ट्र के पालघर जिले के विरार में मौजूद है।

हरे-भरे पहाड़ की गोद में बसा सुप्रसिद्ध ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर आस्था और विश्वास का पहला नाम है। माता भक्तों का दिल से मानना है कि देवी मां अपने साधकों और सेवकों को सुख, शांति, समृद्धि और वैभव का आशीर्वाद देती हैं।

यही वजह है कि हर शुक्रवार के दिन सुबह से शाम तक भक्तों की भीड़ उमड़ी रहती है। ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर विरार, नालासोपारा और वसई की आस्था के मुख्य केंद्रों में से एक है।

Virar Mahalaxmi Mandir

कई माता भक्तों से बातचीत के दौरान पता चला कि इस मंदिर से उनका और उनके परिवार का गहरा संबंध है। उनके जीवन में खुशहाली की मुख्य वजह माता रानी महालक्ष्मी की कृपा है।

उन्हीं की दया से किसी को देश-विदेश में अच्छी जॉब मिली है। किसी को संतान की प्राप्ति हुई है। किसी को कर्ज और रोग से मुक्ति मिली है। किसी को पढ़ाई में अपार सफलता की सीढ़ी मिली है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार आपको बता दें कि ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर को ‘879’ अंक का दर्जा प्राप्त है। वेदों और पुराणों के अनुसार, ‘879’ बेहद शुभ अंक हैं और इसमें अपार शक्ति का वास होता है।

कहते हैं कि इन अंकों का उपयोग मानव जाति की भलाई के लिए किया जाता है। मंदिर में विराजमान माता महालक्ष्मी ‘स्वयंभू’ हैं। स्वयंभू का अर्थ होता है पृथ्वी या भूमि से स्वयं यानी प्राकृतिक रूप से प्रकट होना।

अनोखी कहानी, भक्तों की जुबानी

Virar Hedavde Mahalaxmi Mandir/Temple Story, Address & Timings:

ॐ श्री 879 हेदवडे महालक्ष्मी माता के श्री चरणों में समर्पित इस आर्टिकल में न कोई मिलावट है, न कोई बनावट है और न ही इसमें किसी तरह की कोई कल्पना शामिल है।

विरार स्थित श्री हेदवडे महालक्ष्मी माता की कहानी पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है।

हेदवडे की पावन भूमि और वहां के स्थानीय लोग खुद को धन्य मानते हैं कि उनके पवित्र गांव में प्रत्यक्ष माता महालक्ष्मी विराजमान हैं।

मुंबई और विरार शहर की भीड़भाड़ से दूर एक पहाड़ी की गोद में स्वयं माता महालक्ष्मी का प्रकट होना वाकई में बेहद सौभाग्य की बात है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि देवी महालक्ष्मी हमेशा उसी स्थान पर निवास करती हैं, जहां जल का स्रोत होता है।

यही कारण है कि यह इच्छापूर्ति मंदिर तानसा नदी के बगल यानी उत्तरी तट पर स्थित है।

‘हेदवडे’ मुंबई-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 48 पर स्थित एक छोटा, मगर बहुत प्यारा-सा गांव है।

इसी गांव के नाम पर माता का नाम पड़ा है। इसीलिए, भक्त इन्हें हेदवडे महालक्ष्मी माता कहकर पुकारते हैं।

इस मंदिर के बारे में विशेष रूप से ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति की बुरी दशा चल रही होती है, माता के चरणों में समर्पित होकर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने से सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

यह भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां देवी माता के साथ-साथ नवग्रह मंदिर भी स्वयंभू हैं!

यहां देवी महालक्ष्मी सहित सभी नौग्रहों और कई देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन का सौभाग्य प्राप्त होता है।

मंदिर में श्री पंचमुखी हनुमान जी, पंचमुखी भगवान श्री गणेश जी, दुर्लभतम रूप में पंचमुखी शिवलिंग, विद्या और संगीत की देवी मां सरस्वती जी, श्री दत्त गुरु भगवान जी, श्री शेषनाग मंडल, श्री कुबेर और श्री काल भैरव के दिव्य दर्शन होते हैं।

Hedavde Mahalaxmi Temple

माता रानी के दर्शन, पूजन और ध्यान के बाद मंदिर ट्रस्ट के एक सदस्य से हुई बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि यहां माता महालक्ष्मी स्वयं प्रकट हुई हैं!

इसलिए, इन्हें स्वयंभू हेदवडे महालक्ष्मी माता कहा जाता है। यही जानकारी मंदिर ट्रस्ट की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है।

माता रानी की तरह मंदिर के भीतर स्वयंभू नवग्रह मंदिर है।

यह पूरी दुनिया में अपनी तरह का पहला अनोखा मंदिर है, जहां मूर्तियां उचित स्थिति और सही दिशा में स्थापित हैं।

नवग्रह की सभी मूर्तियों को अखंड ग्रेनाइट पत्थर काटकर बनाया गया है।

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ऐसा माना जाता है कि हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर में विराजमान नवग्रह की पूजा करने से सभी कठिनाइयों और ग्रह पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

नवग्रह के स्थान पर धन के देवता श्री कुबेर की सुंदर मूर्ति स्थापित है।

20वीं सदी में स्थापित इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प और रोमांचक है।

Hedavde Mahalaxmi Temple Story

यह उस समय की बात है, जब सोने की चिड़िया भारत गुलाम होने के बावजूद कृषि प्रधान देश हुआ करता था।

तब उसी समय यानी 14 अगस्त, 1904 को महाराष्ट्र के वसई गांव में परम पूज्य गुरुवर श्री दादा साहेब हाटे जी का जन्म हुआ।

बचपन से ही ज्योतिष विद्या की शिक्षा ग्रहण करने के बाद गुरु जी प्रतिभावान ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान के महाज्ञानी एवं विशेषज्ञ बन गए थे।

वर्तमान समय में ॐ श्री 879 हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर जहां स्थापित है, उसके कुछ ही दूरी पर गुरुवर का खेत हुआ करता था।

खेत और फसल की देखभाल के सिलसिले में उनका हेदवडे अक्सर आना-जाना लगा रहता था।

वसई यानी उनके गांव से हेदवडे की दूरी लगभग 25 किमी है।

अपने घर से खेतों तक की यात्रा तय करने के लिए वे बैलगाड़ी का इस्तेमाल किया करते थे।

उस जमाने में बैलगाड़ी ही मुख्य साधन हुआ करता था।

25 किमी के सफर के दौरान गुरु जी समय-समय पर रूककर अपने बैलों को आराम और चारा-पानी देते।

उनके उन पड़ावों में एक ठहराव उनके मामा का घर या स्थान था, जहां वे अक्सर रुकते थे।

इसी तरह एक दिन लंबी यात्रा की वजह से गुरु जी बहुत अधिक थक गए थे।

प्रचंड गर्मी का महीना और दोपहर की जलती धूप थी।

लक्ष्मी माता की अद्भुत गाथा

अपने बैलों को चारा-पानी देने के बाद गुरु जी एक इमली के छायादार पेड़ के नीचे आराम करने लगे।

संयोग से उस दिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष द्वादशी का शुक्रवार था।

तभी अचानक उनके सामने सफेद रंग की साड़ी पहनें एवं सुंदर आभूषणों से सुसज्जित एक खूबसूरत महिला प्रकट हुईं।

उन्होंने गुरुदेव जी को बताया कि इस जमीन के नीचे मां की दिव्य मूर्ति है।

उसे बाहर निकालो और स्थापना करो।

देवी गुरुवर को आदेश और आशीर्वाद देकर पलक झपकते गायब हो गईं।

इसके बाद तुरंत, देवी द्वारा बताए गए एकदम सटीक स्थान पर खुदाई की गई।

खुदाई के दौरान गुरु जी सहित वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें तब खुली की खुली रह गईं, जब सबने मिट्टी और सिंदूर में सनी देवी लक्ष्मी की अद्भुत और मुस्कुराती हुई प्रतिमा देखी।

उसके बाद गुरु जी ने अपने गुरु श्री नारायण स्वामी के सलाह के अनुसार माता लक्ष्मी की विधिवत स्थापना की।

स्थापना से पहले मूर्ति पर लगी मिट्टी और सिंदूर को पवित्र चंदन की लकड़ी से हटाया गया।

उसके बाद गंगा जल एवं गुलाब जल से स्नान करवाया गया।

शुरू में कार्विस (Karvis) नामक स्थानीय बांस और कौल छत की मदद से 10×10 फीट का एक छोटा-सा मंदिर मां के रहने के लिए बनाया गया।

मंदिर का निर्माण, आस्था का प्रमाण

Virar Hedavde Mahalaxmi Mandir/Temple Story, Address & Timings:

शुरुआत में माता की मूर्ति को दीवार के ठीक सामने स्थापित कर पूजा-अर्चना आदि किया जाने लगा।

लेकिन, कुछ दिनों बाद माता सद्गुरु के सामने प्रकट हुईं।

उन्होंने गुरु जी को अपनी प्रतिमा मंदिर के केंद्र (सेंटर) में स्थापित करने का आदेश दिया।

वजह, मां गरबा खेलती हैं और दीवार की ओर स्थित मूर्ति उनके मार्ग में बाधा बन रही थी।

इस आदेश के बाद तुरंत माता की प्रतिमा को मंदिर के बीचों-बीच फिर से स्थापित किया गया।

मंदिर के नवीनीकरण के दौरान 10×10 का आधार बरकरार रखा गया और वही आकार वर्तमान मंदिर में भी देखा जा सकता है।

मौजूदा समय में भी माता महालक्ष्मी की प्रतिमा गर्भगृह के सेंटर में स्थापित है।

मूर्ति के चारों ओर काफी जगह छूटी हुई है, ताकि मां को गरबा खेलने में कोई परेशानी न हो।

हेदवडे महालक्ष्मी मां समय-समय पर गुरुदेव जी को दर्शन देकर मोक्ष और सुख-शांति का मार्गदर्शन करती रही हैं।

धीरे-धीरे माता की महिमा की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी और भक्तों की संख्या बढ़ती चली गई।

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि चमत्कार को दुनिया नमस्कार करती है।

यह कहावत ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर में भक्तों की बढ़ती भीड़ सिद्ध करती है।

माता रानी का आशीर्वाद पाने के लिए लोग इस मंदिर में बड़ी दूर-दूर से आते हैं।

तभी तो देखते ही देखते एक छोटा-सा मंदिर अब विशाल मंदिर का रूप ले चुका है।

दुनिया का पहला स्वयंभू नवग्रह मंदिर

Virar Hedavde Mahalaxmi Mandir/Temple Story, Address & Timings:

मंदिर के भीतर नवग्रह स्वयंभू मंदिर की कहानी बहुत दिलचस्प है।

इस नवग्रह मंदिर में 9 ग्रहों की बेहतरीन मूर्तियां विराजमान हैं।

उन मूर्तियों को स्वयं से प्रकट हुए एक अखंड काले पत्थर को काट-काटकर बनाया गया है।

शुरू में उस पत्थर को उस स्थान से हटाने के बहुत प्रयास किए गए, जहां मौजूदा समय में वे स्थापित हैं।

इंसान खोदते-खोदते जब थककर हार मान गए, तब जेसीबी का सहारा लिया गया, लेकिन तब भी बात नहीं बनी।

पत्थर का अंत नहीं मिला और ना ही वह अपने जगह से हिला।

उसके बाद उसी स्थान पर उसी पत्थर को काट-काटकर नवग्रहों की स्थापना की गई।

काले पत्थर वाली प्रतिमाओं की नक्काशी और डिज़ाइन काबिले-तारीफ है।

हर मूर्ति के निर्माण में कारीगरी की बेजोड़ प्रतिभा झलकती है।

नवग्रह में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु की भव्य और दिव्य मूर्तियां स्थापित हैं।

यह पूरी दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां सभी ग्रहों की प्रतिमाएं एक साथ, सही स्थान और उचित दिशा में स्थापित हैं।

ऐसा नवग्रह मंदिर समूचे विश्व में नहीं मिलेगा।

जैसा कि हमारे शास्त्रों में बताया गया है, उसी आधार पर सभी मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

जहां केंद्र स्थल पर सूर्य की मूर्ति, वहीं उनकी पूर्व दिशा में चंद्र की प्रतिमा विराजमान है।

दक्षिण दिशा में बुद्ध, उनके पश्चिम में बृहस्पति मौजूद हैं।

उनकी उत्तर तरफ शुक्र और उनकी दक्षिण-पूर्व की ओर मंगल का निवास है।

इसी तरह उनके दक्षिण-पश्चिम में शनि और उनके उत्तर-पश्चिम में राहु तथा उत्तर-पूर्व में केतु स्थित हैं।

प्रत्येक ग्रह के चेहरे पर उसी तरह नक्काशी की गई है, जैसा कि शास्त्रों में ग्रहों का सटीक वर्णन किया गया है।

सही दिशा, सही जगह

Virar Hedavde Mahalaxmi Mandir/Temple Story, Address & Timings:

यह हम सभी जानते हैं कि कुछ ग्रह अशुभ फल देने वाले होते हैं।

ग्रहों से नज़र मिलाना या उनके सामने खड़े होने से पीड़ा बढ़ती है।

यही कारण है कि इस मंदिर में स्थापित सभी ग्रह गहरी समाधि में हैं यानी सभी की आंखें बंद हैं।

इससे वे दर्शन करने वाले भक्तों पर अपनी क्रूर दृष्टि नहीं डाल सकते हैं।

शीर्ष स्तर से देखने पर नवग्रह पर ‘9’ अंक बना दिखाई देता है।

नवग्रह मूर्तियां करीब 27 इंच ऊंची (लगभग 2.5 फीट) हैं।

सभी मूर्तियों के शीर्ष पर बहुत शक्तिशाली और विशिष्ट मंत्र अंकित हैं।

प्रतिमाओं को देखकर लगता है कि जैसे वे जीवंत एवं असली हैं।

नवग्रहों के अलावा नंदी जी की भव्य मूर्ति और देवों के देव महादेव का अद्भुत शिवलिंग स्थापित है।

शिवलिंग में भगवान भोलेनाथ की चार मुख वाली अद्भुत छवि दिखती है।

स्वयंभू नवग्रह मंदिर की दीवार पर श्री नवग्रह स्तोत्र काले पत्थर पर सफेद अक्षरों में अंकित है।

माता रानी के दर्शन के बाद भक्त नवग्रहों के दर्शन और स्तोत्र पाठ करते दिखाई देते हैं।

नाग मंडल की रोचक कहानी

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मंदिर में प्रवेश करने से पहले शेषनाग सहित अन्य नाग-नागिन की अलौकिक प्रतिमाएं दिखाई देती है।

उनके दर्शन-पूजन के बाद ही भक्त आगे बढ़ते हैं।

नाग मंडल में शेषनाग के साथ जुड़वां नर-मादा नाग की मूर्तियां स्थापित हैं।

उस स्थान को नाग मंडल के नाम से जाना जाता है।

मां के अवतार के साथ-साथ नाग मंडल के निर्माण की कहानी बेहद रोचक है।

कहा जाता है कि मौजूदा मंदिर के विस्तार या जीर्णोद्धार के दौरान धन की कमी हो गई थी।

निर्माण सामग्री के बिलों का भुगतान करना मुश्किल था।

तब प्रश्न सत्र के दौरान माता महालक्ष्मी से प्रार्थना की गई और सही उपाय पूछा गया।

मां ने बताया कि मंदिर निर्माण से पहले जोड़ी या जुड़वां सांपों के साथ श्री शेषनाग मंदिर का निर्माण किया जाए।

देवी माता के आदेश का पालन हुआ और शुभ मुहूर्त में नाग मंडल मंदिर में शेषनाग के साथ-साथ जुड़वां सांपों की मूर्तियां स्थापित की गईं।

उसके बाद आज दो मंजिला वाला मां का भव्य घर आपके सामने है।  

नाग मंडल के दर्शन-पूजन से लाभ  

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कहा जाता है कि शेषनाग यानी नाग मंडल के दर्शन-पूजन से वैवाहिक जीवन में चल रही अशांति और संतानहीनता से मुक्ति मिलती है।

नाग मंडल के नियमित पूजन से काल सर्प दोष समाप्त होता है।

जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है कि यह पावन मंदिर पहाड़ की गोद में विराजमान है।

इसलिए, जब-जब मंदिर में कोई पूजा या अनुष्ठान आदि का आयोजन होता है, उस दौरान सुनहरे बालों वाला 10 फीट लंबा गोल्डन कोबरा सांप आता है और भक्तों को आशीर्वाद देता है।

यह चमत्कार कई बार सीसीटीवी फुटेज में कैद हुआ है।

इसके अलावा कुछ विशेष अवसरों पर असली नाग देवता को माता महालक्ष्मी को प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करते देखा गया है।

नाग देवता को केवड़ा फूल, सुपारी, तुलसी, दूर्वा के साथ-साथ अन्य सुगंधित फूल चढ़ाए जाते हैं।

वहीं नैवेद्य में दूध और मिठाई शामिल होती है।

सर्प दोष पूजा के दौरान 1001 नारियल का अभिषेक किया जाता है।

नाग पंचमी के अवसर पर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।

कहते हैं कि नाग मंडल पर किए गए अनुष्ठान से भक्तों को सात पीढ़ियों का आशीर्वाद मिलता है।  

कैसी है हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर की बनावट?

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वर्तमान समय में हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर का रूप बेहद भव्य है।

मंदिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले बड़े हॉल में पंचमुखी हनुमान जी के दिव्य दर्शन होते हैं।

उसी हॉल में श्री काल भैरव बाबा, श्री गणपति भगवान, परम पूज्य बाबा महराज और परम पूज्य दादा महाराज की प्रतिमाएं स्थापित हैं।

दूसरे हॉल में प्रवेश करते ही ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर का गर्भगृह दिखाई देता है।

मंदिर का गर्भगृह काफी बड़ा और अलौकिक अनुभव देता है।

जिस मंदिर में मां विराजमान हैं, उसमें कुल तीन दरवाजे हैं।

पहला दरवाजा यानी मुख्य द्वार पूर्व की दिशा में है। बाकी दो दरवाजे दक्षिण और उत्तर दिशा में हैं।

दर्शन करने वाले भक्त दक्षिण दिशा वाले दरवाजे से गर्भगृह में प्रवेश करते हैं और माता का दर्शन करते हुए उत्तर दिशा से बाहर निकलते हैं।

उसी दिशा में नवग्रह मंदिर स्थापित है।

दक्षिण दिशा की ओर मंदिर में प्रवेश करते समय सबसे पहले कार्य सिद्धि पंचमुखी गणेश, सरस्वती माता और श्री गुरु दत्त जी के दर्शन होते हैं।

प्रतिभा की मूर्ति

तीनों देवी-देवताओं की प्रतिमाएं सफेद संगमरमर में सुशोभित हैं, जिनके दर्शन से गजब के सुकून की अनुभूति होती है।

पंचमुखी गणेश, सरस्वती माता और श्री गुरु दत्त जी के दर्शन करते हुए भक्त मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं।

गर्भगृह में विराजमान माता की प्रतिमा देखकर ऐसा महसूस होता है कि जैसे मां अपने भक्तों को देखकर मुस्कुरा रही हैं।

लाल सिंदूर के रंग में सुसज्जित मां के चेहरे पर गजब का तेज दिखाई देता है।

देखकर ऐसा अनुभव होता है कि जैसे मां अभी अपने बच्चों से बात करने लगेंगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मां की यह प्रतिमा एकदम ओरिजनल है।

खुदाई के दौरान जैसी मिली थी, बिल्कुल वैसी है।

उस मूर्ति में किसी तरह की छेड़खानी नहीं की गई है।

मां की मूर्ति के सामने भगवान गणेश जी की छोटी-सी प्रतिमा और बाघ की मूर्ति स्थापित है।

दो महलों वाले ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर के ऊपर भंडारा प्रसाद की रसोई, भोजन ग्रहण की सुविधा और फ्रेश होने के लिए टॉयलेट आदि की व्यवस्था मौजूद है।

Hedavde Mahalaxmi Temple Timings

अपने अनोखे चमत्कार के लिए ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर की महिमा बड़ी दूर-दूर तक फैली हुई है।

यह पूरे भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जो सप्ताह में केवल एक दिन यानी हर शुक्रवार को खुलता है।

शुक्रवार के अलावा यह मंदिर हर दिन बंद रहता है।

अन्य दिनों पर मंदिर का गेट भक्तों के लिए खुला रहता है, लेकिन गर्भगृह पूरी तरह बंद रहता है।

भक्तों के दर्शन के लिए मुख्य दरवाजे पर कांच लगा है, लोग उसी से माता रानी के दर्शन कर लेते हैं।

शुक्रवार के दिन मंदिर सुबह 9.30 बजे से शाम को 6 बजे तक खुला रहता है।

जो चाहोगे, वो पाओगे

यहां 5 शुक्रवार की मनौती बड़े पैमाने पर मानी जाती है।

ऐसी मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन और विश्वास से 5 शुकवार निरंतर मां के दर्शन और पूजन करता है, उनकी मुरादें अवश्य पूरी होती हैं।

पहले शुकवार से आखिरी शुकवार यानी 5वें शुकवार तक दर्शन करने आने वाले भक्तों का मंदिर ट्रस्ट की ओर से नकद रसीद काटी जाती है।

रसीद में 101 रुपए की राशि शामिल होती है। न उससे एक रुपए कम और न ही एक रुपए ज़्यादा।

आपको बता दें कि पावती में 101 रुपए प्रिंट रहती है।

पांच शुक्रवार पूरा करने वाले भक्तों को छठवें शुक्रवार को एक नारियल खरीदकर मंदिर ट्रस्ट के पास देना होता है।

उस नारियल को मां की महाआरती में पूजा आदि करके भक्तों को लौटा दी जाती है।

भक्त उस नारियल प्रसाद को अपने घर के पूजा घर आदि में रखते हैं, जिससे उन्हें सुख, शांति और समृद्धि का लाभ मिलता है।

इस मंदिर में कर्ज मुक्ति से राहत पाने के लिए विशेष पूजा और मनौती मानी जाती है।

साथ ही नौकरी में सफलता, पढ़ाई में कामयाबी, गृह क्लेश से छुटकारा, आदि जैसी कई समस्याओं से मुक्ति मिलती है।

यही कारण है कि हर शुक्रवार के दिन यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

सुबह से शाम तक लगभग 25 हजार से 50 हजार लोग माता के दर्शन करने आते हैं।

शुक्रवार के दिन सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक भक्तों के लिए महाप्रसाद की फ्री व्यवस्था मंदिर ट्रस्ट की ओर से की जाती है।

उस महाप्रसाद में दाल, भात, रोटी, सब्जी, सलाद जैसी अन्य खाद्य वस्तुएं शामिल होती हैं।

सुबह 11 से 12 के बीच मां महालक्ष्मी की महाआरती की जाती है।

Virar Mahalaxmi Temple Address

सबसे पहले आपको बता दें कि श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर को ‘ॐ श्री 879’ के नाम से भी जाना जाता है।

यह भव्य मंदिर महाराष्ट्र के पालघर जिले के विरार पूर्व में स्थित है।

मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग 48 पर मुंबई-अहमदाबाद हाइवे से 2 किमी पश्चिम की ओर स्थित है।

विरार फाटा से 4-5 किमी पालघर की ओर जाने पर खानिवडे आता है, जो कि नेशनल हाइवे पर पड़ता है।

मुंबई से अहमदाबाद जाते समय विरार फाटा से लगभग 4-5 किमी की दूरी पर तानसा नदी पुल पड़ता है।

नदी के ब्रिज को पार करने के बाद बायीं तरफ यानी पश्चिम दिशा में भगवान श्री राम का भव्य मंदिर, खानिवडे में स्थापित है।

उसी मंदिर के सामने से रास्ता गुजरता है, जिस पर करीब 2 किमी चलने के बाद माता का मंदिर आ जाता है।

तानसा पुल से पश्चिम की तरफ देखने पर माता का मंदिर पहाड़ के ऊपर दिखाई देता है।

मंदिर के ऊपरी हिस्से में पहाड़ की चोटियां और हरियाली का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

मंदिर से सटे हुए कई घर हैं। उसके बाद पक्की सड़क गुजरती है।

पक्की सड़क के जस्ट बगल यानी मंदिर के दक्षिण तरफ तानसा नदी और फिर पहाड़ का सुंदर रूप और उसमें बसे कई घर दिखाई देते हैं।

घोड़बंदर ब्रिज से मंदिर की दूरी 28 किमी है।

वसई गांव से 25 किमी, विरार फाटा से 6 किमी (उत्तर की ओर) और शिरसाट फाटा से 5.7 किमी है।

नजदीकी एयरपोर्ट मुंबई और सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन विरार, नालासोपारा और वसई है।

छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से हेदवडे की दूरी लगभग 55 किमी है।

विरार स्टेशन से कैसे पहुंचें?

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विरार रेलवे स्टेशन से ऑटो या महाराष्ट्र राज्य परिवहन बस द्वारा खानिवडे गांव बड़े आराम से पहुंचा जा सकता है।

हर 30 मिनट के अंतराल पर विरार से खानिवडे के लिए बस सेवा उपलब्ध है।

खानिवडे से मंदिर की दूरी लगभग 2 किमी के करीब है।

वहां से आप पैदल या ऑटो के जरिए मिनटों में पहुंच सकते हैं।

आप दिनभर या दो-चार घंटे में दर्शन करके लौट सकते हैं।

गांव होने की वजह से यहां रुकने के लिए होटल आदि की सुविधा मौजूद नहीं है।

अगर आप बाहर से आ रहे हैं तो होटल मुंबई या विरार सिटी या समुद्र किनारे अथवा हाइवे आदि पर ले सकते हैं।

नेशनल हाइवे पर आपको कई बेहतरीन रेस्टोरेंट और होटल आदि मिल जाएंगे।

ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी जी के दर्शन के बाद आप श्री वज्रेश्वरी योगिनी मंदिर और जीवदानी माता के दर्शन कर सकते हैं।

हेदवडे से वज्रेश्वरी की दूरी लगभग 20-25 किमी है और जीवदानी माता का मंदिर लगभग 15 किमी है।

विरार फाटा से श्री वज्रेश्वरी योगिनी मंदिर, वज्रेश्वरी पूर्व दिशा की ओर स्थित है और श्री जीवदानी माता मंदिर पश्चिम दिशा की ओर स्थित है।

आप एक दिन में ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी, विरार; श्री वज्रेश्वरी योगिनी माता मंदिर, वज्रेश्वरी; श्री जीवदानी माता मंदिर, विरार और श्री तुंगारेश्वर मंदिर, वसई के दर्शन बड़े आराम से कर सकते हैं।

यह भी देखें: श्री वज्रेश्वरी योगिनी देवी मंदिर के बारे में जानें

यह भी देखें: श्री जीवदानी माता मंदिर विरार के बारे में जानें

ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर में होने वाले अनुष्ठान

इस पावन मंदिर में अभिषेक सेवा, 879 महालक्ष्मी माता के पांच शुक्रवार नवस/मन्नत, अन्नदान और तुलादान (तुलाभारम) आदि बड़े पैमाने पर किया जाता है।

अभिषेक सेवा क्या है?

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अभिषेक सेवा के दौरान देवी महालक्ष्मी जी का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है।

पंचामृत में गाय का दूध, घी और दही, शहद और चीनी शामिल होती है।

पुराणों के अनुसार गौ माता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है।

पवित्र वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ किया गया दही अभिषेक मनोकामनाएं पूरी करने में मदद करता है।

हेदवडे महालक्ष्मी माता रानी का दही अभिषेक प्रत्येक शुक्रवार को सुबह 10 बजे से किया जाता है, जिसमें भक्तों को स्वयं अभिषेक करने का सौभाग्य मिलता है।

इसे नवास या मन्नत अभिषेक भी कहा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति लगातार पांच शुक्रवार को यह अभिषेक करता है, उसकी मनोकामनाएं महालक्ष्मी माता की कृपा से पूरी हो जाती हैं।

पंचामृत अभिषेक से बाधाएं दूर होती हैं और असंभव कार्य संभव हो जाते हैं। 

879 महालक्ष्मी माता के पांच शुक्रवार नवस/मन्नत

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नवस या मन्नत का अर्थ यह हुआ कि देवी महालक्ष्मी के सामने भक्त द्वारा अपनी इच्छा या मन्नत कही जाती है।

बदले में अपनी इच्छानुसार उचित उपहार देवी रानी को अर्पित करने का वादा किया जाता है।

इसे मराठी में ‘नवस’ के नाम से जाना जाता है।

गुरु जी का कहना था कि “यदि आप सच्चे मन से माता रानी से कुछ मांगेंगे तो देवी रानी आपकी वह इच्छा अवश्य पूरी करेंगी।”

अब तक हजारों लोगों की मनोकामनाएं यहां पूरी हुई हैं।

निःसंतान दम्पति संतान प्राप्ति और नौकरी के इच्छुक व्यक्ति अनुकूल नौकरी की मांग मां से कर सकते हैं।

इसके लिए माता रानी का पंचामृत अभिषेक और साड़ी-चोली यानी वस्त्र भेंट करना शुभ माना जाता है।

पहले शुक्रवार को मन में एक संकल्प लेना होता है, जहां भक्त मां से अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए कहते हैं।

मनौती मानने वाले व्यक्ति के लिए लगातार पांच शुक्रवार तक माता रानी के दर्शन-पूजन करना अनिवार्य है।

पांच शुक्रवार पूरा होने के बाद भक्तों को माता रानी का महाप्रसाद दिया जाता है।

पांचवें शुक्रवार को पूरे परिवार के साथ अभिषेक करने का परम सौभाग्य मिलता है।

उस दौरान साड़ी, फल और मिठाई आदि मां को समर्पित किया जाता है।

नवास या मन्नत पूरा होने के बाद 2 शुक्रवार के भीतर अपनी मनौती पूरी करनी होती है।

याद रहे आपने जो भी वादा माता रानी से किया है, उसे हर हाल में पूरा करना अनिवार्य है।

भक्तों को चेतावनी दी गई है कि वे ऐसे वादे मां से बिल्कुल न करें, जिन्हें पूरा न किया जा सके।

अन्यथा उसका दुष्परिणाम हो सकता है।

अन्नदान का महत्त्व

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किसी भी पूजा या अनुष्ठान की तुलना में अन्नदान का महत्त्व सबसे ऊपर है।

अन्नदान माता महालक्ष्मी की कृपा पाने का सबसे प्रभावशाली तरीका माना जाता है।

कलियुग में अन्नदान सभी पापों को नष्ट करने, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने और बेहतर सेहत पाने के लिए सबसे फलदायी दान माना गया है।

हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर वर्षों से मुफ्त अन्नदान की परंपरा के लिए भी जाना जाता रहा है।

हर शुक्रवार के दिन मंदिर में करीब 25,000 से 50,000 भक्त महालक्ष्मी माता का महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।

यह शुभ कार्य भक्तों द्वारा दी जाने वाली निःशुल्क सेवा से पूरा होता है।

इस अवसर पर भक्त सब्जियां काटने से लेकर भोजन पकाने तक, बर्तन धोने से लेकर, साफ-सफाई करने तक में अपना पूरा सहयोग देते हैं।

उनकी इस सेवा से देवी महालक्ष्मी माता प्रसन्न होती हैं।

महाप्रसाद में भाग लेने के लिए आप चावल, तेल, दाल आदि का दान कर सकते हैं।

साथ ही अपनी सेवा देकर महालक्ष्मी माता के परिवार का हिस्सा बन सकते हैं।

मां की असीमित कृपा पाने के लिए प्रतिवर्ष कम से कम 21 सेवाएं भक्तों द्वारा दी जाती हैं।

तुलादान के लाभ

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सबसे पहले आपको बता दें कि तुलादान या तुलाभारम भारतवर्ष का सबसे प्राचीन और प्रभावशाली अनुष्ठान रहा है।

तुलाभारम का अर्थ यह हुआ कि तराजू के एक हिस्से पर एक व्यक्ति बैठता है और दूसरे हिस्से पर अपने वजन अनुसार चावल, तेल, सोना-चांदी, अनाज, फूल, गुड़ आदि को तौलकर माता रानी को अर्पित करता है।

यह आमतौर पर तब किया जाता है, जब भक्त की इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।

वह कष्टों और दुखों से उबर जाता है।

तुलादान भगवान के प्रति व्यक्त किया गया एक प्रकार का संकल्प है।

ॐ श्री हेदवडे महालक्ष्मी मंदिर के भीतर माता रानी की नज़रों के सामने बड़ा-सा तराजू है।

मंदिर पिछले 80 वर्षों से इस प्रथा को निभा रहा है।

अब तक लोगों ने अपने बच्चों की समृद्धि और वृद्धि के लिए लाखों के तुलादान किए हैं।

तुलाभारम से कष्ट कम या तो पूरी तरह खत्म हो जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि यदि तुलादान उत्तम सामग्री का किया जाए तो सात पीढ़ियों तक समृद्धि बरकरार रहती है।

तिल के तेल से शनि पीड़ा के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।

बृहस्पति का आशीर्वाद पाने के लिए चना दाल अर्पित करें।

चंद्रदेव की कृपा पाने के लिए चावल का दान करें।

माता महालक्ष्मी की दया पाने के लिए सिक्कों का दान यानी तुलादान करें।

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आभार – ॐ श्री हेदावडे महालक्ष्मी मंदिर

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